<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Classroom performance decline attention span issue youth Archives - Bharat Samachar | Hindi News Channel</title>
	<atom:link href="https://bharatsamachartv.in/keyword/classroom-performance-decline-attention-span-issue-youth/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://bharatsamachartv.in/keyword/classroom-performance-decline-attention-span-issue-youth/</link>
	<description>Hindi News Channel from Lucknow, UP</description>
	<lastBuildDate>Wed, 20 May 2026 10:49:51 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>

<image>
	<url>https://bharatsamachartv.in/wp-content/uploads/2021/10/cropped-Bha-32x32.png</url>
	<title>Classroom performance decline attention span issue youth Archives - Bharat Samachar | Hindi News Channel</title>
	<link>https://bharatsamachartv.in/keyword/classroom-performance-decline-attention-span-issue-youth/</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>रील के शोर में खो रहा बच्चों का बचपन, पेरेंट्स की मोबाइल की लत बिगाड़ रही है नौनिहालों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य?</title>
		<link>https://bharatsamachartv.in/parents-mobile-addiction-is-ruining-childrens-childhood-learn-about-the-impact-on-their-mental-health/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Bharat Samachar Ad]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 May 2026 10:49:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ट्रेंडिंग]]></category>
		<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[Child psychology emotional distance from busy parents attention]]></category>
		<category><![CDATA[Classroom performance decline attention span issue youth]]></category>
		<category><![CDATA[Digital parenting challenges social media reels negative effects]]></category>
		<category><![CDATA[Family communication breakdown smartphone intervention society]]></category>
		<category><![CDATA[How to reduce screen time practical parenting tips]]></category>
		<category><![CDATA[Instant gratification dopamine loop videos danger toddlers]]></category>
		<category><![CDATA[Lack of sleep in school children behavior changes]]></category>
		<category><![CDATA[Parents mobile addiction impact on children mental health]]></category>
		<category><![CDATA[Screen time disadvantages for kids sleep cycle disruption]]></category>
		<category><![CDATA[Special editorial feature article on modern lifestyle India.]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://bharatsamachartv.in/?p=174496</guid>

					<description><![CDATA[<img width="783" height="566" src="https://bharatsamachartv.in/wp-content/uploads/2026/05/reel.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin-bottom: 5px; clear:both;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://bharatsamachartv.in/wp-content/uploads/2026/05/reel.jpg 783w, https://bharatsamachartv.in/wp-content/uploads/2026/05/reel-300x217.jpg 300w, https://bharatsamachartv.in/wp-content/uploads/2026/05/reel-768x555.jpg 768w" sizes="(max-width: 783px) 100vw, 783px" /><p>आज के आधुनिक और तकनीकी युग में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का सबसे अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सुबह आंख खुलने से लेकर रात को बिस्तर पर जाने तक, हमारा हाथ अनजाने में ही बार-बार स्मार्टफोन की तरफ खिंचा चला जाता है। अमूमन लोग कुछ मिनटों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खोलते हैं, लेकिन रील्स &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://bharatsamachartv.in/parents-mobile-addiction-is-ruining-childrens-childhood-learn-about-the-impact-on-their-mental-health/">रील के शोर में खो रहा बच्चों का बचपन, पेरेंट्स की मोबाइल की लत बिगाड़ रही है नौनिहालों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य?</a> appeared first on <a href="https://bharatsamachartv.in">Bharat Samachar | Hindi News Channel</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="783" height="566" src="https://bharatsamachartv.in/wp-content/uploads/2026/05/reel.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin-bottom: 5px; clear:both;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://bharatsamachartv.in/wp-content/uploads/2026/05/reel.jpg 783w, https://bharatsamachartv.in/wp-content/uploads/2026/05/reel-300x217.jpg 300w, https://bharatsamachartv.in/wp-content/uploads/2026/05/reel-768x555.jpg 768w" sizes="(max-width: 783px) 100vw, 783px" />
<p>आज के आधुनिक और तकनीकी युग में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का सबसे अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सुबह आंख खुलने से लेकर रात को बिस्तर पर जाने तक, हमारा हाथ अनजाने में ही बार-बार स्मार्टफोन की तरफ खिंचा चला जाता है। अमूमन लोग कुछ मिनटों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खोलते हैं, लेकिन रील्स (Reels) और शॉर्ट्स (Shorts) जैसे छोटे व तेजी से बदलने वाले वीडियो कंटेंट इंसानी दिमाग को इस कदर बांध लेते हैं कि देखते ही देखते घंटों का समय रेत की तरह हाथ से फिसल जाता है। यह बदलती आदत केवल वयस्कों या बड़ों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका सबसे गहरा, मूक और चिंताजनक प्रभाव हमारे घर के मासूम बच्चों पर पड़ रहा है। अक्सर समाज में बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम (Screen Time) और मोबाइल इस्तेमाल पर चिंता जताई जाती है, लेकिन बहुत कम लोग इस कड़वे सच पर ध्यान देते हैं कि बच्चों की इस बिगड़ती दिनचर्या के पीछे कहीं न कहीं स्वयं माता-पिता (Parents) की डिजिटल आदतें ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।</p>



<p>आज अधिकांश शहरी और अर्ध-शहरी घरों में एक दृश्य बेहद सामान्य और हर रोज का हिस्सा बन चुका है। घर के किसी कोने में मम्मी इंस्टाग्राम या फेसबुक पर रील्स स्क्रॉल कर रही हैं, पापा अपने फोन पर किसी अन्य सोशल मीडिया या काम में व्यस्त हैं और वहीं पास बैठा बच्चा उनका ध्यान (Attention) पाने के लिए लगातार छटपटा रहा है। बच्चा कभी स्कूल की कोई बात बताना चाहता है, तो कभी अपना कोई नया खिलौना या ड्राइंग दिखाना चाहता है; लेकिन जवाब में उसे माता-पिता की तरफ से बिना आंखें हटाए सिर्फ एक रूखा सा वाक्य सुनने को मिलता है— &#8220;बेटा, बस एक मिनट।&#8221; धीरे-धीरे यही &#8216;एक मिनट&#8217; का टालमटोल बच्चों और पेरेंट्स के बीच एक ऐसी गहरी खाई और भावनात्मक दूरी पैदा करने लगता है, जिसे बाद में भर पाना नामुमकिन हो जाता है।</p>



<p><strong>घर ही है पहला स्कूल: बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं</strong></p>



<p>यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि बच्चों का पहला स्कूल उनका अपना घर होता है और उनके पहले शिक्षक उनके माता-पिता होते हैं। बच्चे किताबों या बाहरी दुनिया से ज्ञान प्राप्त करने से बहुत पहले अपने घर के माहौल और माता-पिता के व्यवहार को देखकर चीजें सीखते और अपनाते हैं। अगर किसी घर के माहौल में हर समय माता-पिता के हाथ में फोन रहेगा, तो बच्चों के अवचेतन मन को भी यही लगेगा कि हर वक्त स्क्रीन से चिपके रहना ही एक सामान्य जीवन शैली है।वर्तमान समय में स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि दो से तीन साल के छोटे बच्चे भी बिना मोबाइल स्क्रीन पर कार्टून या वीडियो देखे खाना खाने को तैयार नहीं होते। कई घरों में जब बच्चे रोते हैं या जिद करते हैं, तो पेरेंट्स अपनी सहूलियत के लिए और उन्हें तुरंत चुप कराने के लिए उनके हाथों में स्मार्टफोन थमा देते हैं। धीरे-धीरे यह स्क्रीन टाइम उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन जाता है। नतीजा यह होता है कि बच्चे बाहरी दुनिया, शारीरिक खेल-कूद और आपसी बातचीत को छोड़कर बंद कमरों में स्क्रीन देखना ज्यादा पसंद करने लगते हैं।</p>



<p>सबसे बड़ी और व्यावहारिक समस्या तब खड़ी होती है जब माता-पिता खुद देर रात तक बिस्तर पर लेटे-लेटे मोबाइल का इस्तेमाल करते रहते हैं। भले ही बच्चे उस समय सीधे तौर पर फोन का इस्तेमाल न कर रहे हों, लेकिन उसी कमरे में बजने वाली रील्स की आवाज, स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) और घर का जागता हुआ माहौल सीधे तौर पर बच्चों की नाजुक नींद को प्रभावित करता है। छोटे बच्चे प्राकृतिक रूप से जल्दी सोना चाहते हैं, लेकिन जब घर का पूरा वातावरण ही देर रात तक जागने वाला और डिजिटल शोर से भरा हो जाए, तो उनकी जैविक घड़ी (Biological Clock) बिगड़ जाती है और उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती है।</p>



<p><strong>अधूरी नींद का दुष्प्रभाव: चिड़चिड़ापन और व्यवहार में बदलाव</strong></p>



<p>चिकित्सक, बाल रोग विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक हमेशा इस बात पर जोर देते हैं कि बढ़ते बच्चों के बेहतर मानसिक, संज्ञानात्मक और शारीरिक विकास के लिए कम से कम 8 से 10 घंटे की गहरी और सुकुन भरी नींद बेहद जरूरी है। लेकिन आज की इस डिजिटल आपाधापी में बहुतायत बच्चों की नींद पूरी नहीं हो पा रही है। रात में देर तक जागने और घर में डिजिटल व्यवधान होने की वजह से बच्चे सुबह उठते समय अत्यधिक थके हुए और बोझिल महसूस करते हैं। स्कूल जाने के समय उनका मन पूरी तरह चिड़चिड़ा रहता है। जब ये बच्चे अधूरी नींद के साथ स्कूल पहुंचते हैं, तो क्लासरूम में उनका ध्यान पढ़ाई या किसी भी अन्य रचनात्मक गतिविधि पर नहीं लग पाता। आज कई प्रतिष्ठित स्कूलों के शिक्षकों की यह आम शिकायत है कि बच्चे पढ़ाई के दौरान बार-बार जम्हाई लेते हैं, उनींदे (नींद में) रहते हैं या किसी भी विषय में रुचि नहीं दिखाते। शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह बच्चों का सिर्फ सामान्य आलस नहीं है; बल्कि यह उनके थके हुए दिमाग और अधूरी नींद का प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव है। जब किसी बच्चे का मस्तिष्क रात में पूरी तरह आराम नहीं कर पाता, तो उसका दैनिक व्यवहार भी तेजी से बदलने लगता है। वह बहुत जल्दी गुस्सा करने लगता है, छोटी-छोटी बातों पर रोने लगता है, सहपाठियों से झगड़ा करता है और मानसिक रूप से खुद को अस्थिर महसूस करता है। कई बार माता-पिता बच्चों के इस बदले स्वरूप को उनकी जिद, बदतमीजी या अनुशासनहीनता समझ लेते हैं, जबकि इसकी असली और गहरी वजह उनके घर की बिगड़ी हुई दिनचर्या और नींद की भारी कमी होती है।</p>



<p><strong>एक शिक्षक की आपबीती: झकझोर देने वाली सच्ची घटना</strong></p>



<p>डिजिटल पैरेंटिंग के इस भयावह पक्ष को उजागर करने वाली एक सच्ची घटना हाल ही में एक जाने-माने स्कूल से सामने आई है, जिसने शिक्षाविदों और समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। स्कूल की एक प्राथमिक शिक्षिका ने एक बेहद भावुक और स्तब्ध कर देने वाला किस्सा साझा किया। शिक्षिका ने बताया कि उनकी कक्षा में पहली क्लास में पढ़ने वाली एक महज सात साल की मासूम बच्ची लगातार दो दिनों तक क्लास में बेंच पर सोती हुई पाई गई। जब शिक्षिका ने बच्ची की इस हालत को देखा, तो उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और प्यार से इसका कारण पूछा। शिक्षिका के इतना पूछते ही बच्ची की आंखों से आंसू छलक पड़े। मासूम बच्ची ने रुआंसे स्वर में जो बताया, वह किसी भी संवेदनशील माता-पिता की आंखें खोलने के लिए काफी है। बच्ची ने बताया कि उसकी मम्मी रात भर मोबाइल पर रील्स (Reels) देखती रहती हैं, जिससे कमरे में लगातार शोर होता रहता है और रोशनी के कारण वह ठीक से सो नहीं पाती है। फिर सुबह स्कूल वैन के समय के कारण उसे जल्दी उठा दिया जाता है। नींद पूरी न होने के चलते उसे क्लास में तेज सिरदर्द होता है और वह सो जाती है। शिक्षिका ने बताया कि इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया कि कैसे आधुनिक माता-पिता मनोरंजन के चक्कर में अपने ही बच्चों के स्वास्थ्य को दांव पर लगा रहे हैं। जब स्कूल प्रशासन ने इस संबंध में बच्ची के माता-पिता को बुलाकर बात की, तो उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की और माना कि वे इस गंभीर पहलू पर ध्यान ही नहीं दे पा रहे थे।</p>



<p>शिक्षिकाओं का कहना है कि यह सिर्फ एक बच्ची का मामला नहीं है, बल्कि कई अन्य बच्चों के साथ भी लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं। स्कूलों ने अब कड़े शब्दों में अभिभावकों को सचेत किया है कि वे सोशल मीडिया और रील्स की आभासी दुनिया से बाहर निकलकर अपने बच्चों के वास्तविक विकास पर ध्यान केंद्रित करें।</p>



<p><strong>पारिवारिक संवाद का अंत और बढ़ता अकेलापन</strong></p>



<p>यदि हम कुछ साल पीछे मुड़कर देखें, तो घरों में रात का समय पूरे परिवार के लिए एक पवित्र और सामूहिक समय होता था। परिवार के सभी सदस्य साथ बैठकर भोजन करते थे, दिनभर की बातें साझा करते थे, बच्चे अपने स्कूल के अनुभव बताते थे और दादा-दादी या नानी बच्चों को नैतिक कहानियां सुनाती थीं। लेकिन आज इस पारंपरिक पारिवारिक ताने-बाने को स्क्रीन ने पूरी तरह लील लिया है। आज हर शख्स अपने व्यक्तिगत गैजेट और स्क्रीन की दुनिया में व्यस्त है। नतीजतन, आज बच्चों को अपने ही माता-पिता का वह अनन्य ध्यान (Undivided Attention) नहीं मिल पाता, जिसके वे हकदार हैं। जब एक बच्चा अपने माता-पिता से कोई सवाल पूछता है या अपनी कोई भावना व्यक्त करता है, तो उसे अक्सर अधूरा या आधा-अधूरा जवाब मिलता है, क्योंकि माता-पिता की आंखें लगातार फोन स्क्रीन पर टिकी होती हैं। धीरे-धीरे बच्चे के कोमल मस्तिष्क में यह बात बैठ जाती है कि उनके माता-पिता के लिए मोबाइल फोन उनसे कहीं ज्यादा जरूरी और महत्वपूर्ण है। इसका सीधा और नकारात्मक असर बच्चों के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान (Self-esteem) पर पड़ता है। वे अपनी बातें खुलकर साझा करना बंद कर देते हैं और गहरे अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं। कुछ बच्चे इस उपेक्षा के कारण पूरी तरह शांत और अंतर्मुखी हो जाते हैं, तो कुछ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए जरूरत से ज्यादा गुस्सैल और आक्रामक व्यवहार करने लगते हैं।</p>



<p><strong>अति इस्तेमाल का मानसिक खतरा और स्क्रीन की मायावी गति</strong></p>



<p>यहाँ यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि तकनीकी या सोशल मीडिया अपने आप में पूरी तरह खराब या नकारात्मक नहीं हैं। आज इसी मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से लोग दुनिया भर की नई चीजें सीख रहे हैं, ज्ञानवर्धन कर रहे हैं, अपने व्यवसाय का संचालन कर रहे हैं और वैश्विक स्तर पर अपनों से जुड़े हुए हैं। अतः समस्या तकनीक नहीं है, बल्कि समस्या उसका अनियंत्रित और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल है। आधुनिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और रील्स के एल्गोरिदम को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि वह मानवीय मस्तिष्क में डोपामाइन (Dopamine) का स्राव बढ़ाए, जिससे व्यक्ति लगातार बिना रुके वीडियो देखता रहे। एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा स्वतः शुरू हो जाता है, जिससे दिमाग को बिना किसी मेहनत के तुरंत मनोरंजन (Instant Gratification) मिलने लगता है।माता-पिता अक्सर यह सोचते हैं कि वे तो बस कुछ मिनटों के लिए ही फोन देख रहे हैं, लेकिन बच्चे उन मिनटों और उस अलगाव को बिल्कुल अलग और दुखद तरीके से महसूस करते हैं। बच्चों को समय की गणित समझ में नहीं आती, वे केवल &#8216;अटेंशन&#8217; यानी ध्यान को समझते हैं। जब उन्हें वह ध्यान नहीं मिलता, तो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। लगातार तेजी से बदलते छोटे-छोटे वीडियो देखने के कारण बच्चों की एकाग्रता अवधि (Attention Span) बहुत कम होती जा रही है। वे लंबे समय तक किसी एक चीज, जैसे किताब पढ़ने या होमवर्क करने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। जब बच्चा हर समय तेज गति वाले डिजिटल कंटेंट का आदी हो जाता है, तो उसे स्कूल की व्यवस्थित पढ़ाई और वास्तविक जीवन की गति अत्यंत धीमी और बोरिंग लगने लगती है। किताबों में तुरंत मनोरंजन या विजुअल इफेक्ट्स नहीं मिलते, इसलिए उन्हें पढ़ना बच्चों के लिए कठिन और उबाऊ काम हो जाता है। यही कारण है कि आज के बच्चों में एंग्जायटी (चिंता), अवसाद, चिड़चिड़ापन और बिना वजह का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है।</p>



<p><strong>शिक्षकों की चिंता और भावी पीढ़ी का संकट</strong></p>



<p>आज देश भर के विभिन्न स्कूलों और अनुभवी शिक्षकों ने बच्चों के भीतर आ रहे इस व्यवहारिक और मनोवैज्ञानिक बदलाव को बहुत गहराई से महसूस किया है। शिक्षकों का स्पष्ट मानना है कि पहले के दौर की तुलना में वर्तमान समय के बच्चों का ध्यान पढ़ाई से बहुत ज्यादा भटक चुका है। वे बहुत जल्दी शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाते हैं, उनमें धैर्य (Patience) की भारी कमी देखी जा रही है और वे छोटी सी बात पर भी बहुत जल्दी विचलित या बेचैन हो जाते हैं। कई मामलों में जब काउंसलर्स बच्चों की जांच करते हैं, तो पता चलता है कि समस्या बच्चे की सीखने की क्षमता में नहीं है, बल्कि उसके घर के अशांत और डिजिटल वातावरण में है। शिक्षक और स्कूल बच्चों को दिन के केवल 5 से 6 घंटे संभाल सकते हैं और उन्हें सही दिशा दे सकते हैं, लेकिन किसी भी बच्चे के चरित्र, आदतों और मानसिक स्वास्थ्य की असली और मजबूत नींव उसके घर में ही बनती है। अगर घर के भीतर माता-पिता द्वारा स्क्रीन टाइम को अनुशासित और नियंत्रित नहीं किया जाएगा, तो उसका सीधा नकारात्मक असर स्कूल के रिपोर्ट कार्ड और बच्चे के व्यवहार में साफ तौर पर दिखाई देगा।</p>



<p><strong>समाधान की राह: पेरेंट्स को उठाने होंगे ये जरूरी कदम</strong></p>



<p>इस गंभीर समस्या का समाधान कोई बहुत ज्यादा कठिन या असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए माता-पिता को सबसे पहले शुरुआत खुद के व्यवहार में बदलाव करके करनी होगी। बाल मनोवैज्ञानिकों ने पेरेंट्स के लिए कुछ बेहद सरल और प्रभावी सुझाव दिए हैं:</p>



<ul class="wp-block-list">
<li>व्यवहार में बदलाव: बच्चों के सामने हर समय और लगातार फोन का इस्तेमाल करने की आदत से पूरी तरह बचें। यदि कोई जरूरी काम हो, तभी फोन छुएं।</li>



<li>डिजिटल डिटॉक्स: रात में सोने के तय समय से कम से कम एक घंटा पहले घर के सभी मोबाइल फोन और गैजेट्स को खुद से दूर रख दें ताकि कमरे का माहौल शांत हो सके।</li>



<li>क्वालिटी टाइम: प्रतिदिन कम से कम एक से दो घंटे का समय ऐसा निर्धारित करें, जिसमें बिना किसी मोबाइल या स्क्रीन के माता-पिता अपने बच्चों के साथ बैठें, उनसे बातें करें और खेलें।</li>



<li>नो मोबाइल जोन: घर में भोजन करने के समय (Dining Time) को पूरी तरह से ‘नो मोबाइल रूल’ के तहत लाएं। खाना खाते समय किसी भी सदस्य के हाथ में फोन नहीं होना चाहिए।</li>



<li>वैकल्पिक आदतें: बच्चों को गैजेट्स से दूर रखने के लिए उन्हें बाहरी शारीरिक खेल-कूद, चित्रकारी, संगीत, या अच्छी ज्ञानवर्धक किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करें।</li>



<li>महत्व का अहसास: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपके बच्चों को दिल से यह महसूस होना चाहिए कि वे किसी भी चमकदार स्क्रीन या सोशल मीडिया की रील्स से आपके लिए लाख गुना ज्यादा महत्वपूर्ण और अनमोल हैं।</li>
</ul>
<p>The post <a href="https://bharatsamachartv.in/parents-mobile-addiction-is-ruining-childrens-childhood-learn-about-the-impact-on-their-mental-health/">रील के शोर में खो रहा बच्चों का बचपन, पेरेंट्स की मोबाइल की लत बिगाड़ रही है नौनिहालों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य?</a> appeared first on <a href="https://bharatsamachartv.in">Bharat Samachar | Hindi News Channel</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>

<!--
Performance optimized by W3 Total Cache. Learn more: https://www.boldgrid.com/w3-total-cache/?utm_source=w3tc&utm_medium=footer_comment&utm_campaign=free_plugin

Page Caching using Disk: Enhanced 
Lazy Loading (feed)

Served from: bharatsamachartv.in @ 2026-05-21 01:21:11 by W3 Total Cache
-->