
भारतीय रेलवे में सुधार की दिशा में लगातार संघर्ष का सामना किया जा रहा है। सरकार की नीति और सरकारी दवाब में अड़चनें उसकी पूरी क्षमता को रुकवा रही हैं। रेलवे के प्राइवेटाइजेशन को लेकर सरकार का संकोच उसके सुधार एजेंडे को कमजोर कर रहा है, जो पहले ही कई दशकों से अधूरा पड़ा है।
- तीन दशकों का आधा-अधूरा रिफॉर्म और पॉलिसी में विरोधाभास
तीन दशकों से भारतीय रेलवे ने अपनी संरचना में सुधार करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें गैर-कोर गतिविधियों को अलग करना और कमर्शियल डिसिप्लिन लाने के लिए focused business organizations (FBOs) बनाना शामिल है। हालांकि, इन उपायों से रेलवे का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका है और इसका असर उसके बिज़नेस मॉडल पर पड़ा है। इसके साथ ही, सरकार के रिफॉर्म एजेंडे के खिलाफ काम कर रहे रेलवे मंत्रालय ने प्राइवेटाइजेशन की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं, जिससे इस सेक्टर की विकास दर कम हो गई है।
- कैप्टिव मार्केट, धीमी प्रगति
रेलवे के सरकारी उपक्रमों (CPSUs) को सरकारी मालिकाना हक मिलने के कारण इन कंपनियों को कम कॉम्पिटिटिव दबाव का सामना करना पड़ता है, जिससे इनकी ग्रोथ धीमी हो गई है। जब मालिकाना हक, रेगुलेशन और कस्टमर एक ही मंत्रालय के अधीन हो, तो कंपनियों में एफिशिएंसी और इनोवेशन की कमी होती है।
- CONCOR का मामला: रिफॉर्म पर पंगु बना फैसला
कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CONCOR) के डिसइन्वेस्टमेंट के फैसले में देर से यह दिखता है कि सरकारी निर्णय प्रक्रियाएं कितनी लचर हैं। बार-बार घोषणाओं के बावजूद इस निर्णय को लागू करने में रुकावटें आ रही हैं। यह स्थिति ना केवल CONCOR की विकास क्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि भारत के लॉजिस्टिक्स सुधारों की दिशा में भी बड़ा रोड़ा बन रही है।
- कैबिनेट मंज़ूरी को नज़रअंदाज़ करना
कैबिनेट द्वारा CONCOR में सरकार की 54.8% हिस्सेदारी में से 30.8% की बिक्री की मंज़ूरी दी गई थी, लेकिन इस निर्णय को लागू करने में भारी देरी हो रही है। यह प्रशासनिक विफलता को दिखाता है और इससे सरकार की नीति की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।
- मज़बूत एसेट्स पर परफ़ॉर्मेंस की सीमित आज़ादी
CONCOR एक प्रॉफिटेबल एंटरप्राइज़ है, जिसमें बड़ी मात्रा में संसाधन और एक व्यापक नेटवर्क है, लेकिन सरकारी नियंत्रण के कारण इसकी विकास क्षमता को पूरी तरह से अनलॉक नहीं किया जा सका। प्राइवेटाइजेशन के जरिए इसका पूरा फायदा उठाया जा सकता था, जिससे देश में लॉजिस्टिक्स क्षेत्र की ग्रोथ में तेजी आती।
- रेगुलेटरी दबाव और हितों का टकराव
रेल मंत्रालय के पास कई तरह के हित होते हैं—वह एक ही समय में मालिक, रेगुलेटर और शेयरहोल्डर होता है। इससे हितों का टकराव होता है और यह नीति के क्रियान्वयन में अड़चन डालता है।
- प्राइवेटाइजेशन को ग्रोथ मल्टीप्लायर के रूप में देखना
CONCOR के स्ट्रेटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट को सिर्फ़ एसेट लिक्विडेशन के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे ग्रोथ के एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकारी नियंत्रण से इसे मिलने वाले अवसरों का पूरा फायदा उठाया जा सकता है।
- सुधार की दिशा में एक ठोस संकेत की जरूरत
सरकार को पूरी तरह से “ऑन होल्ड” स्थिति को खत्म करना चाहिए और 2026-27 तक CONCOR के स्ट्रेटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट के लिए एक पक्की टाइमलाइन बनानी चाहिए। इससे सुधार की विश्वसनीयता बढ़ेगी और मंत्रालय के अंदर के हितों के टकराव को कम किया जा सकेगा।
रेलवे सुधार 2: मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और समय पर काम न हो पाना
भारत में रेलवे के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स अक्सर समय पर पूरे नहीं हो पाते, जो देश के विकास के लिए बड़ी रुकावट बन गए हैं। इसके कारण रेलवे की ग्रोथ और लॉजिस्टिक्स की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
- कैपेसिटी सैचुरेशन
भारतीय रेलवे के हाई-डेंसिटी रूट्स पहले ही सैचुरेटेड हैं, जो पैसेंजर और माल ढुलाई दोनों की ग्रोथ को प्रभावित कर रहे हैं। बार-बार प्रयासों के बावजूद, इन समस्याओं का समाधान धीरे-धीरे और रिएक्टिव तरीके से किया गया है, जो लंबे समय तक स्थायी नहीं हो सकता।
- बढ़ता कैपिटल एलोकेशन और सीमित असर
भले ही रेलवे को अब पहले से ज्यादा फंडिंग मिल रही है, लेकिन बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए पर्याप्त नतीजे नहीं देखने को मिल रहे। DFC कॉरिडोर जैसे सफल प्रयासों के बावजूद, इस फंड का सही उपयोग करने में सरकार सफल नहीं हो पाई है।
- समय और लागत में बढ़ोतरी
रेलवे के प्रोजेक्ट्स में लगातार देरी और लागत में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। यह न सिर्फ़ प्रशासनिक नाकामियों को दर्शाता है, बल्कि सार्वजनिक धन के नुकसान का भी कारण बनता है।
- स्ट्रेटेजिक मायोपिया
रेलवे को नई फ्रेट कॉरिडोर्स को मंजूरी देने में देरी हो रही है, जो बड़ी लॉजिस्टिक्स समस्याओं का समाधान कर सकते थे। इन प्रोजेक्ट्स के बिना, रेलवे के विकास को पूरी तरह से अनलॉक नहीं किया जा सकता।
- PPP-लेड एग्ज़िक्यूशन की ज़रूरत
रेलवे को अब प्राइवेट कंपनियों के साथ PPP मॉडल के तहत काम करना चाहिए, ताकि बड़ी परियोजनाओं को समय पर पूरा किया जा सके और सिस्टम की कैपेसिटी बढ़ाई जा सके।









