
कभी देवी की भक्ति और जीवन के प्रतीक के रूप में किया जाता था गरबा, आज बन चुका है करोड़ों के कारोबार का हिस्सा। आखिर समय के साथ कैसे बदल गई इसकी परंपरा?
नवरात्रि आते ही गुजरात से लेकर देश के कई हिस्सों तक गरबा की धूम दिखाई देने लगती है। रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े, ढोल की थाप और गोल घेरे में थिरकते कदम इस उत्सव की पहचान हैं। लेकिन गरबा केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि मां शक्ति की आराधना से जुड़ी एक पुरानी सांस्कृतिक परंपरा भी है। समय के साथ इसके स्वरूप में कई बदलाव आए हैं और आज यह धार्मिक उत्सव के साथ-साथ बड़े व्यावसायिक आयोजनों का हिस्सा भी बन चुका है।
गर्भदीप से जुड़ी है गरबा की परंपरा
गरबा की पारंपरिक पहचान छेद वाले मिट्टी के घड़े और उसके भीतर जलते दीपक से जुड़ी है। इसे गर्भदीप की अवधारणा से जोड़ा जाता है। मिट्टी के पात्र को गर्भ और उसके भीतर जलती लौ को जीवन तथा ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। नर्तक इस दीप या देवी की स्थापना के चारों ओर गोल घेरे में नृत्य करते हैं। यह परंपरा विशेष रूप से नवरात्रि में मां अंबे की आराधना से जुड़ी है।
गरबा शब्द की उत्पत्ति और इसके धार्मिक अर्थ को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। इसकी शुरुआत कब हुई, इसकी कोई निश्चित ऐतिहासिक तारीख उपलब्ध नहीं है।
गांवों के आंगन से बड़े आयोजनों तक
पहले गरबा ग्रामीण और शहरी समुदायों में पारंपरिक गीतों, स्थानीय संगीत और सामूहिक भागीदारी के साथ किया जाता था। समय के साथ इसका आयोजन बड़े मैदानों और सार्वजनिक स्थलों तक पहुंचा। आधुनिक संगीत, मंच, लाइटिंग और बड़े आयोजनों ने इसके अनुभव को बदल दिया।
आज कई जगह गरबा बड़े टिकट वाले कार्यक्रमों और व्यावसायिक आयोजनों का हिस्सा है। इससे कलाकारों, संगीतकारों, आयोजकों और पारंपरिक पोशाकों से जुड़े कारोबार को भी अवसर मिलते हैं।
क्या आधुनिकता ने परंपरा को नुकसान पहुंचाया?
गरबा के बदलते स्वरूप को लेकर दो तरह के विचार सामने आते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि आधुनिक संगीत और व्यावसायिक आयोजनों के बढ़ते प्रभाव से पारंपरिक लोकगीतों तथा धार्मिक भावनाओं को कम जगह मिलती है। वहीं, दूसरे लोग इसे परंपरा के विस्तार और नई पीढ़ी तक पहुंचने का माध्यम मानते हैं।
इसलिए यह कहना कि गरबा का पूरी तरह सत्यानाश हो गया है, एक राय हो सकती है, स्थापित तथ्य नहीं। आधुनिक रूप और पारंपरिक स्वरूप के बीच संतुलन बनाए रखना ही इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की महत्वपूर्ण चुनौती है।
यूनेस्को से मिली वैश्विक पहचान
दिसंबर 2023 में गरबा को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। इससे इस नृत्य की सांस्कृतिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
सवाल यही है कि क्या आधुनिकता के साथ गरबा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को भी उतनी ही मजबूती से बचाया जा रहा है? गरबा का बदलता स्वरूप इसी बहस को जन्म देता है कि परंपरा को जीवित रखने के लिए बदलाव जरूरी हैं, लेकिन उसकी मूल पहचान को समझना भी उतना ही आवश्यक है।









