आजादी के दीवानों की अनसुनी कहानी, काशी में गुमनामी की जिंदगी जी रहे स्वतंत्रता सेनानी !

अंग्रेजी हुकूमत से देश को आजाद हुए 75 वर्ष पूरे हो गए है. आजादी के इस उत्सव को इस बार आजादी के अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है. अंग्रेजी हुकूमत से आजादी के इन 75 वर्षो के बाद भी कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानी है, जो आज भी गुमनामी की जिंदगी जी रहे है. ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी काशी के 95 वर्षीय तिलक राज कपूर है.

रिपोर्ट : नीरज कुमार जायसवाल, वाराणसी

वाराणसी : अंग्रेजी हुकूमत से देश को आजाद हुए 75 वर्ष पूरे हो गए है. आजादी के इस उत्सव को इस बार आजादी के अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है. अंग्रेजी हुकूमत से आजादी के इन 75 वर्षो के बाद भी कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानी है, जो आज भी गुमनामी की जिंदगी जी रहे है. ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी काशी के 95 वर्षीय तिलक राज कपूर है. जिन्हे आजादी के आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा कोड़ों की सजा से ज्यादा देश के विभाजन में अपनो से बिछड़ने का दर्द कुरेद रहा है. आज भी तिलक राज पाकिस्तान में अपनो से मिलने और आजादी की लड़ाई की उन लम्हों को याद करने की इच्छा अपने मन में संजोए बैठे है.

पाकिस्तान से विस्थापित होकर काशी पहुंचे तिलक राज कपूर…

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होकर अंग्रेजी हुकूमत से लड़ने वाले तिलक राज कपूर काशी में गुमनामी की जिंदगी जी रहे है. तिलक राज आजादी से पहले पाकिस्तान के लाहौर के पास मंडी नामक गांव में रहते थे. आजादी के बाद भारत के बटवारे के बाद अपने रिश्तेदारों से बिछड़ मात्र 3 जोड़ी कपड़े लेकर वह भारत पहुंचे. वाराणसी के सिगरा क्षेत्र के परेडकोठी इलाके में रहकर अपना जीवन यापन करते है. तिलक राज एक समाजसेवी भी है और इन्हें इनके कामों के बदौलत राष्ट्रपति ने सम्मानित भी किया है. तिलक राज बताते है, कि वह चाहते है, कि वह एक बार मौजूदा पाकिस्तान में अपने गांव जाकर अपनो से मुलाकात करे.

आजादी की लड़ाई में गुप्तचर का किया कार्य, पकड़े जाने पर मिली कोड़े मारने की सजा…

तिलक राज कपूर ने बताया कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्कूल में पढ़ते थे और उन्हें गुप्तचर का कार्य दिया गया था. वह अपने स्कूल के बस्ते (बैग) में आंदोलनकारियों के संदेश को एक जिले से दूसरे जिले में ले जाने का काम करते. उन्होंने बताया कि आंदोलन की सभा के दौरान उन्हें झंडा फहराने का कार्य सौंपा जाता था. सत्याग्रह के दौरान जब अंग्रेजी हुकूमत के सिपाही सत्याग्रहियों को गिरफ्तार करती तभी उन्हें झंडा फहराना रहता था. तिलक राज बताते है, कि झंडा फहराकर वह मौके से फरार हो जाते थे, लेकिन 3 बार उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के बाद सजा के तौर पर उन्हें कोड़े मारने की सजा सुनाई गई.अंग्रेजी हुकूमत के सामने सिपाही आंदोलनकारियों को बेहद ही यातना देते थे.

अंग्रेजी हुकूमत के जख्मों से ज्यादा अपनो के खोने का दर्द…

आजादी की लड़ाई में अपना योगदान देने वाले तिलक राज कपूर बताते है कि अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा आजादी के आंदोलन के दौरान दी जाने वाली सजा उन्हें उतना दर्द नही दिया, जो दर्द आजादी के बाद विभाजन ने दिया. पाकिस्तान में विभाजन के बाद इस्लामिक कट्टर सोच रखने वाले काबिलियों ने दिया. आजादी के बाद उनके सामने शर्त रखी गई, कि वह या तो इस्लाम काबुल करे या देश छोड़कर चले जाए. ऐसे में उनके परिजन पाकिस्तान से लौटकर भारत में आए और कैंप में 2 महीने बिताने के बाद काशी में आकर बस गए. वही उन लम्हों को याद कर तिलक राज कपूर के दर्द ताजे हो जाते है, जब उन्हे अपनो के साथ बिताए हुए लम्हे याद आते है. तिलक राज ने बताया कि जितना दर्द अंग्रेजी हुकूमत के कोड़े की मार से नही हुआ, उतना आज भी उन्हें पाकिस्तान के विभाजन से हुआ है.

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