लखनऊ में दांडी मार्च की 96वीं वर्षगांठ पर निकली प्रतीकात्मक पदयात्रा, गांधीजी के विचारों को याद किया गया

यह पदयात्रा जन भवन से शुरू होकर हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा, खादी आश्रम और परिवर्तन चौक होते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में जाकर समाप्त हुई।

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की प्रेरणा और मार्गदर्शन में लखनऊ में ऐतिहासिक दांडी मार्च की स्मृति में एक प्रतीकात्मक पदयात्रा का आयोजन किया गया। यह यात्रा जन भवन से शुरू हुई, जिसे विशेष कार्याधिकारी (अपर मुख्य सचिव स्तर) डॉ. सुधीर महादेव बोबडे ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यात्रा से पहले जन भवन परिसर में गांधीजी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

यह पदयात्रा जन भवन से शुरू होकर हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा, खादी आश्रम और परिवर्तन चौक होते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में जाकर समाप्त हुई। यात्रा के दौरान अधिकारियों, कर्मचारियों और छात्रों ने गांधीजी के आदर्शों को याद किया और श्रद्धांजलि दी।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. सुधीर महादेव बोबडे ने कहा कि दांडी यात्रा केवल नमक कानून के विरोध का आंदोलन नहीं था, बल्कि यह सत्य, साहस और जनशक्ति का प्रतीक था। उन्होंने कहा कि गांधीजी के सत्य, अहिंसा, स्वच्छता और आत्मनिर्भरता जैसे विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

विशेष कार्याधिकारी (शिक्षा) डॉ. पंकज एल. जानी ने कहा कि दांडी मार्च भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने देशभर में स्वतंत्रता की चेतना जगाई। उन्होंने बताया कि 6 अप्रैल 1930 को गुजरात के दांडी में महात्मा गांधी ने नमक कानून तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की थी।

कार्यक्रम में लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति अरविंद मोहन ने कहा कि दांडी आंदोलन केवल नमक कानून के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह जनभागीदारी के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का संदेश भी देता है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में गांधीजी के सिद्धांत आज भी मार्गदर्शक हैं।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी दांडी यात्रा और गांधीजी के विचारों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में लखनऊ विश्वविद्यालय, जन भवन, खेल महाविद्यालय और अन्य संस्थानों के अधिकारी, कर्मचारी और छात्र बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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