
लखनऊ। डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती के मौके पर उत्तर प्रदेश में दलित वोटों को साधने की होड़ के बीच एक नया ‘रंग युद्ध’ छिड़ गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल के दिनों में नीले गमछे और ‘पीडीए’ (PDA) के बैनर तले नीले रंग के इस्तेमाल पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मायावती ने बिना नाम लिए अखिलेश यादव और विपक्षी दलों पर जमकर हमला बोला।
नकल से कुछ नहीं होगा : मायावती
मायावती ने सपा के इस कदम को दलितों को गुमराह करने वाला ‘हथकंडा’ करार दिया। उन्होंने कहा कि जो पार्टियां हमेशा दलित-विरोधी रही हैं, वे अब केवल नीले रंग का सहारा लेकर दलितों का हितैषी बनने का ढोंग कर रही हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, सिर्फ नीला रंग ओढ़ लेने या नीले झंडे लगा लेने से कोई दलितों का सच्चा हमदर्द नहीं बन जाता। दलित समाज भली-भांति जानता है कि उनका असली कारवां कौन सा है। नीले रंग का वास्तविक प्रभाव और जुड़ाव सिर्फ बसपा और बाबासाहेब के मिशन के साथ है।
सपा का ‘नीला’ प्रयोग और PDA रणनीति
गौरतलब है कि अखिलेश यादव ने पिछले कुछ समय से अपनी रैलियों और कार्यक्रमों में नीले रंग के गमछे और झंडों को प्रमुखता दी है। सपा इसे अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले के तहत दलितों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाने की रणनीति के तौर पर देख रही है। अंबेडकर जयंती पर अखिलेश का नीला गमछा पहनकर भंडारे में शामिल होना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो मायावती को रास नहीं आया है।
2027 के चुनाव की आहट
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती की यह तल्खी 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए है। बसपा अपनी परंपरागत ‘नीली’ पहचान पर किसी अन्य दल का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं करना चाहती। मायावती ने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे ऐसी ‘नकली’ ताकतों से सावधान रहें जो उनके वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं।
कारवां को पीछे धकेलने की साजिश
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मायावती ने आरोप लगाया कि जब-जब बसपा मजबूती से उभरती है, विपक्षी दल भ्रम फैलाने के लिए नए प्रतीक अपना लेते हैं। उन्होंने इसे दलित आंदोलन के कारवां को पीछे धकेलने की एक बड़ी साजिश करार दिया और दोहराया कि बसपा ही दलितों के अधिकारों की एकमात्र रक्षक है।









