डिजिटल इंडिया या डिवाइडेड इंडिया?…जानिए इस खबर में

नतीजा यह होता है कि ज्ञान, अवसर और यहां तक कि सुरक्षा तक की पहुंच भी असमान रह जाती है, जिससे डिजिटल स्पेस में पितृ सत्ता और गहरी हो जाती है।

“डिजिटल इंडिया” अब सरकार के भाषणों, कॉरपोरेट विज्ञापनों और स्कूल की किताबों में गूंजता है। यूपीआई
पेमेंट, ऑनलाइन क्लासरूम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ भारत ने खुद को एक ग्लोबल टेक लीडर की
छवि में दिखाया है।

भारतीय दरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) केअनुसार, भारत में 80 करोड़ सेज्यादा लोग इंटरनेट का
इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इसकी पहुंच और वितरण बेहद असमान है। जहां ग्रामीण भारत आज भी स्थिर कनेक्शन
के लिए जूझ रहा है, वहीं शहरी भारत लगातार नई इंफ्राटेक सुविधाओं सेअपग्रेड हो रहा है। महामारी के दौरान,
हजारों छात्रों ने पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि उनके पास इंटरनेट, बिजली और डिवाइस नहीं थे। तो क्या यह सचमुच
डिजिटल इंडिया है या सिर्फ अर्बन इंडिया?


तकनीक से बनी खाई
आज स्मार्टफोन विलासिता नहीं, ज़रूरत है। लेकिन रोज़ कमाने-खाने वाले परिवारों के लिए बच्चों को डिवाइस
खरीदना संभव नहीं। ऑनलाइन एग्ज़ाम और डिजिटल क्लासरूम ने कई छात्रों को शिक्षा से बाहर कर दिया।
किसानों को मौसम बताने वाले ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फसल बेचने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
लेकिन इंटरनेट न होने पर ये साधन उनके किसी काम नहीं आते। भारत की तकनीकी प्रगति अब सशक्तिकरण से
ज़्यादा बहिष्कार का साधन बन गई है।


महिलाओं के लिए डिजिटल खाई


रिसर्च बताती है कि भारत में इंटरनेट यूज़र्स में केवल लगभग एक-तिहाई महिलाएं हैं। डिजिटल डिवाइड सिर्फ
आर्थिक नहीं, लैंगिक भी है। कई घरों में लड़कों को स्मार्टफोन दिया जाता है जबकि लड़कियों को मना किया जाता
है। नतीजा यह होता है कि ज्ञान, अवसर और यहां तक कि सुरक्षा तक की पहुंच भी असमान रह जाती है, जिससे
डिजिटल स्पेस में पितृ सत्ता और गहरी हो जाती है।

भारत नेसिलिकॉन वैली केलिए इंजीनियर दिए और दुनिया की बड़ी आईटी इंडस्ट्रीज़ खड़ी कीं। फिर भी इसके
अपनेनागरिक पीछेरह गए। यह विरोधाभास बताता हैकि “डिजिटल इंडिया” एक ब्रांड तो बन रहा है, पर हकीकत
नहीं। कोई भी देश सच मेंडिजिटल नहीं हो सकता अगर इसकी पहुंच सिर्फ कु छ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों तक ही
सीमित रहे।


डिजिटल समानता की ज़रूरत


डिजिटल डिवाइड को पाटना सिर्फ इंटरनेट पहुंचाने का मामला नहीं है— यह समान शिक्षा और रोज़गार के अवसर
देनेका भी सवाल है। वरना अमीर-गरीब, शहर-गांव और पुरुष-महिला के बीच की खाई और चौड़ी होती जाएगी।
“डिजिटल इंडिया” को सिर्फ तेज़ नेटवर्क नहीं, बल्कि न्यायपूर्णनेटवर्क की गारंटी देनी होगी—जहांहर बच्चा
ऑनलाइन पढ़ सके, हर किसान बाज़ार सेजुड़ सकेऔर हर नागरिक गरिमा केसाथ डिजिटल दुनिया में भाग ले
सके ।

रिपोर्ट- पद्म्जा सिंह

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