
गरीबी और असमानता: वैश्विक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
पीढ़ियों से “गरीबी” और “असमानता” शब्द हमारे सामने रहे हैं। ये दोनों ही प्रगति में बड़ी बाधाएं हैं। विश्व स्तर पर इनके समाधान के प्रयास जारी हैं, लेकिन देश और क्षेत्रों के अनुसार इनकी गंभीरता और स्वरूप अलग होता है। बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) को समझकर ही समावेशी विकास संभव है। गरीबी के स्वरूप समय के साथ बदलते रहते हैं, इसलिए इसे परिभाषित करना और नीतिगत रूप से संबोधित करना चुनौतीपूर्ण है।
भारत में गरीबी और असमानता पर नीतिगत कदम
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर आय असमानता मापी जाती है। भारत भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कार्य कर रहा है। 2015 से NITI आयोग 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के तहत 248 संकेतकों से प्रदर्शन की निगरानी कर रहा है। राज्यों की पहल भी महत्वपूर्ण रही है। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश ने “Swarna Andhra 2047 – 10 Sutras” विकसित किए हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत 2047 दृष्टिकोण से मेल खाते हैं।
मूल्यांकन और सेवाओं की उपलब्धता
गरीबी उन्मूलन, असमानता कम करने और नागरिकों तक सेवाएं पहुंचाने के लिए प्रदर्शन का मूल्यांकन माइक्रो और मैक्रो स्तर पर किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं देशों का रैंकिंग करती हैं, वहीं राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर जिले-दर-जिले निगरानी की जाती है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देकर अब प्रदर्शन की वस्तुनिष्ठ जांच की जा रही है।
विकसित भारत की दृष्टि और उपलब्धियां
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने बहुआयामी गरीबी में सुधार देखा है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 2012–13 से अब तक 35 मिलियन में से 27 मिलियन लोग तीव्र गरीबी से बाहर आए हैं। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री की प्रमुख योजनाओं ने अंत्योदय की भावना से लाभ को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने में मदद की है।
असमानता को समझना और समावेशी विकास
असमानता को इस रूप में समझा जा सकता है कि नागरिकों की बुनियादी आवश्यकताओं और सेवाओं का वास्तविक उपयोग क्षमता के बीच अंतर है। इसे कम करने के लिए केंद्र सरकार ने SDG संकेतकों के अनुरूप योजना प्रदर्शन को समायोजित किया है। आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की Swarna Andhra 10 Sutras इसी दिशा में राज्य के विकास और राष्ट्रीय लक्ष्य में योगदान देती हैं।
विकसित भारत केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि हर व्यक्ति, परिवार और राज्य को सशक्त बनाने से साकार होगा। गरीबी उन्मूलन, असमानता में कमी और समावेशी विकास के निरंतर प्रयास से ही भारत में समानता, गरिमा और समृद्धि सुनिश्चित की जा सकती है।









