
अमेरिका इन दिनों अपने सहयोगी देशों के साथ और जिन देशों के साथ में डील चल रही है…उन सभी देशों के सामने अलग रैवैया अपनाए हुए है….अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ट्रेड डील हो या फिर कुछ और अपनी बात मनवाने के लिए शर्त पर शर्त रखते हैं…पर इस वक्त वो जिन भी देशों के लिए अपनी कोई भी नई चाल चलते हैं वो उनपर ही उल्टा पड़ जाता है.
क्योंकि धीरे-धीरे करके सारे ही देश अमेरिका से दूरी बनाने में लगे हुए है…चाहें वो ग्रीनलैंड का मुद्दा हो या फिर कुछ और….या फिर ये कहें कि भारत और ईयू की ऑल डील्स…अमेरिका को इस वक्त कुछ भी नहीं भा रहा है…
और खास बात ये है कि ट्रंप के मनमाने और एकतरफा रवैये के चलते पश्चिमी देशों के रिश्ते अमेरिका से डांवाडोल हो गए हैं, और अब वे अपने हितों के लिए एशिया की ओर रुख कर रहे हैं.इसका ताजा उदाहरण ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की चीन यात्रा है, जो 28 जनवरी को बीजिंग पहुंचे थे…यह आठ साल बाद किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री का पहला चीन दौरा है.
ब्रिटेन और अमेरिका हमेशा से करीबी साझेदार रहे हैं, लेकिन ट्रंप के आने के बाद ब्रिटेन अब इस दोस्ती पर आश्वस्त नहीं है. विश्लेषकों के मुताबिक, ट्रंप का रवैया पश्चिमी सहयोगियों के लिए एक बड़ा झटका बन गया है. यूरोपीय संघ और भारत के बीच हाल ही में व्यापारिक समझौते पर सहमति बनी है, जिसका श्रेय ट्रंप फैक्टर को दिया जा रहा है.
दूसरी ओर कीर स्टार्मर ने अपनी यात्रा का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा कि चीन के द्वारा प्रदान किए जा रहे आर्थिक अवसरों को नजरअंदाज करना ब्रिटेन के लिए मुमकिन नहीं है. शुतुरमुर्ग की कहावत का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि “चीन से बातचीत करना हमारे हित में है.” बीजिंग में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से उनकी मुलाकात होने वाली है, और बाद में वह शंघाई जाएंगे, जहां वह स्थानीय कारोबारियों से संवाद करेंगे।
हालांकि, ब्रिटेन की सुरक्षा चिंताएं चीन के साथ रिश्तों में खटास का कारण रही हैं. चीन पर ब्रिटिश अधिकारियों की जासूसी करने, सुरक्षा को खतरे में डालने और राजनीतिक हस्तक्षेप करने के आरोप हैं. ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि चीन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम हो सकता है. बावजूद इसके, कीर स्टार्मर ने स्पष्ट किया है कि वह चीन से आर्थिक फायदे लेने के बावजूद राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे.
स्टार्मर की यह यात्रा, ट्रंप के प्रति पश्चिमी देशों की निराशा और नए साझेदारों की तलाश का प्रतीक बन सकती है.









