मिडिल ईस्ट संकट बढ़ा तो भारत के कई सेक्टर पर असर संभव, बासमती चावल से लेकर एविएशन तक पर पड़ सकता है प्रभाव

केवल करीब 10 प्रतिशत औद्योगिक ईंधन के रूप में इस्तेमाल होता है, इसलिए उद्योगों पर इसका असर सीमित रह सकता है।

पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव अगर और बढ़ता है या लंबे समय तक बना रहता है तो इसका असर भारत के कई अहम सेक्टरों पर पड़ सकता है। रेटिंग एजेंसी Crisil Ratings की एक रिपोर्ट के मुताबिक बासमती चावल, उर्वरक, डायमंड पॉलिशिंग, ट्रैवल ऑपरेटर और एयरलाइंस जैसे सेक्टर सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं क्योंकि इनका बड़ा कारोबार मिडिल ईस्ट क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सिरेमिक और उर्वरक जैसे सेक्टर, जो बड़े पैमाने पर LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) पर निर्भर हैं, उन्हें भी निकट भविष्य में उत्पादन संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए इन क्षेत्रों पर लगातार निगरानी रखने की जरूरत है।

Crisil के अनुसार अगर पश्चिम एशिया में अस्थिरता लंबे समय तक जारी रहती है तो क्रूड ऑयल से जुड़े सेक्टर भी प्रभावित होंगे। इनमें ऑयल रिफाइनिंग, टायर, पेंट, स्पेशियलिटी केमिकल्स, फ्लेक्सिबल पैकेजिंग और सिंथेटिक टेक्सटाइल उद्योग शामिल हैं। ऊर्जा की कीमतें बढ़ने पर इन उद्योगों की लागत और मुनाफे दोनों पर असर पड़ सकता है।

भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल और लगभग आधा LNG आयात करता है। इनमें से करीब 40 से 50 प्रतिशत कच्चा तेल और 50 से 60 प्रतिशत LNG की आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होती है।

रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ते तनाव के कारण 1 मार्च 2026 से कई शिपिंग जहाजों ने इस मार्ग से गुजरना बंद कर दिया है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और LNG की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है और कीमतें और बढ़ सकती हैं।

रिपोर्ट के अनुसार ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत पहले ही जनवरी-फरवरी 2026 के औसत 66-67 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 82-84 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है। वहीं एशियाई स्पॉट LNG की कीमत भी करीब 10 डॉलर/MMBtu से बढ़कर 24-25 डॉलर/MMBtu तक पहुंच गई है।

ऊर्जा की कीमतों में और बढ़ोतरी होने पर भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है और महंगाई पर भी असर पड़ सकता है। इसके साथ ही उद्योगों की लागत बढ़ने से कंपनियों की लाभप्रदता पर भी दबाव पड़ सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत अपने कुल LPG (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) का लगभग दो-तिहाई हिस्सा आयात करता है और इसका अधिकांश हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। हालांकि LPG का ज्यादातर उपयोग घरेलू खपत में होता है और केवल करीब 10 प्रतिशत औद्योगिक ईंधन के रूप में इस्तेमाल होता है, इसलिए उद्योगों पर इसका असर सीमित रह सकता है।

बासमती चावल निर्यात भी इस संकट से प्रभावित हो सकता है क्योंकि भारत के कुल बासमती निर्यात का करीब 70 से 72 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों में जाता है। पिछले वित्त वर्ष में भारत ने लगभग 60 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया था।

इसके अलावा उर्वरक सेक्टर पर भी दबाव बढ़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 30 प्रतिशत उर्वरक आयात करता है, जिसमें से लगभग 40 प्रतिशत आपूर्ति पश्चिम एशिया से होती है।

एविएशन सेक्टर पर भी असर पड़ सकता है क्योंकि भारतीय एयरलाइंस की लगभग 10 प्रतिशत उड़ानें पश्चिम एशिया से होकर गुजरती हैं। अगर हवाई क्षेत्र बंद होते हैं या दुबई जैसे प्रमुख एयरपोर्ट पर संचालन प्रभावित होता है तो ईंधन लागत बढ़ सकती है और एयरलाइंस के मुनाफे पर असर पड़ सकता है।

हालांकि Crisil का मानना है कि फिलहाल अधिकांश भारतीय कंपनियों पर इसका तात्कालिक असर सीमित रह सकता है क्योंकि उनकी बैलेंस शीट मजबूत है और वे मौजूदा अनिश्चितताओं का सामना करने में सक्षम हैं।

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