
भारत ने पिछले 11 वर्षों में रक्षा निर्यात में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की है। FY14 में 686 करोड़ रुपये से बढ़कर FY25 में यह 23,622 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह लगभग 34 गुना वृद्धि है। विशेषज्ञों के अनुसार, औद्योगिक लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं का सरलकरण, पुर्जों को लाइसेंस से मुक्त करना और निर्यात नियमों में ढील जैसे कदमों ने भारत को रक्षा उपकरणों का बड़ा निर्यातक बनाने में मदद की है।
FY25 में भारत के रक्षा निर्यात ने 12% की बढ़त के साथ रिकॉर्ड 23,622 करोड़ रुपये का आंकड़ा छुआ, जबकि FY24 में यह 21,083 करोड़ था। रक्षा मंत्रालय का लक्ष्य FY26 में निर्यात को 30,000 करोड़ रुपये से ऊपर ले जाना है। मंत्रालय ने 2029 तक यह लक्ष्य 50,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाने का भी संकेत दिया है।
रक्षा मंत्रालय के बयान के अनुसार, अब भारत एक आयात-निर्भर सेना से स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इस वित्तीय वर्ष में 80 देशों को गोला-बारूद, हथियार, सब-सिस्टम्स, और पुर्जे निर्यात किए गए हैं।
पूर्व DRDO निदेशक रवि गुप्ता के अनुसार, भारत ने आधुनिक और भविष्य की युद्ध तकनीकों में महारत हासिल कर ली है। ब्रह्मोस मिसाइल, K4, K15 बैलिस्टिक मिसाइल, आर्टिलरी गन्स और टेक्नोलॉजी से लैस राइफल्स को विदेशी खरीदारों का ध्यान मिला है।
FY25 में DPSUs ने 42.9% की बढ़ोतरी के साथ कुल 8,389 करोड़ रुपये का निर्यात किया, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान 15,233 करोड़ रुपये रहा। कुल मिलाकर, FY14-24 दशक में रक्षा निर्यात 21 गुना बढ़कर 88,319 करोड़ रुपये हो गया।
भारत अब 100 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात करता है, जिनमें अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया शीर्ष स्थान पर हैं। दक्षिण पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका भी प्रमुख बाजार हैं।
भारत के निर्यात में बुलेटप्रूफ जैकेट, डॉर्नियर (Do-228) विमान, चेतक हेलीकॉप्टर, फास्ट इंटरसेप्टर बोट और लाइटवेट टॉरपीडो जैसे आधुनिक उपकरण शामिल हैं।









