ईरान- अमेरिका तनाव में ‘ऑप्टिकल जीत’ की तलाश, ट्रंप की रणनीति पर विदेशी मामलों के विशेषज्ञ का बड़ा दावा

ट्रंप चाहते हैं कि ईरान के यूरेनियम ड्रम्स की एक तस्वीर मिले, जिसमें अमेरिकी सेना उसे अपने कब्जे में लेकर ले जा रही हो।

विदेश नीति विशेषज्ञ रॉबिंदर सचदेव ने अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इस पूरे विवाद में रणनीति से ज्यादा “विजुअल जीत” (symbolic victory) की अहम भूमिका है, जिसे अमेरिका वैश्विक स्तर पर दिखाना चाहता है।

एक इंटरव्यू में सचदेव ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ऐसा प्रतीकात्मक क्षण चाहते हैं, जिसे पूरी दुनिया में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जा सके। उन्होंने कहा, “ट्रंप चाहते हैं कि ईरान के यूरेनियम ड्रम्स की एक तस्वीर मिले, जिसमें अमेरिकी सेना उसे अपने कब्जे में लेकर ले जा रही हो। यह एक ऐसा विजुअल होगा जिसे वह अपनी जीत के रूप में पेश कर सकें।”

उन्होंने कहा कि इस तरह की छवि किसी देश के आत्मसमर्पण का प्रतीक बन जाएगी, जिसे ईरान स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है। इसी वजह से बातचीत में गतिरोध बना हुआ है।

आर्थिक मुद्दों पर बात करते हुए सचदेव ने कहा कि रूस से तेल आयात पर अमेरिका की छूट भारत के लिए राहत लेकर आ सकती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा संकट के बीच रूसी तेल की उपलब्धता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है, क्योंकि खाड़ी देशों से सप्लाई बहाल होने में अभी समय लगेगा।

ईरान-अमेरिका वार्ता को लेकर उन्होंने कहा कि अगर बातचीत में सभी पक्ष शामिल होते हैं तो समझौते की संभावना बढ़ सकती है, हालांकि यह कोई “ग्रैंड डील” नहीं होगी। उन्होंने संभावना जताई कि समझौते की संभावना लगभग 51 प्रतिशत है।

होर्मुज स्ट्रेट को लेकर उन्होंने कहा कि किसी भी समाधान में इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग का खुला रहना जरूरी है। उन्होंने बताया कि ईरान इसके बदले आर्थिक मुआवजे और प्रतिबंधों में राहत की मांग कर सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत में मुख्य रूप से तीन मुद्दे होंगे—प्रतिबंधों में राहत, विदेशों में फंसे धन की वापसी और आर्थिक मुआवजा।

नाटो और यूरोप को लेकर सचदेव ने कहा कि अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप यूरोप की नीतियों से असंतुष्ट हैं, खासकर रक्षा और पर्यावरण नीतियों को लेकर। उन्होंने कहा कि अमेरिका का मानना है कि यूरोपीय देश रक्षा खर्च में बराबरी का योगदान नहीं दे रहे हैं।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक राजनीति में अमेरिका-ईरान तनाव, तेल आपूर्ति और मध्य पूर्व की स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ी हुई हैं।

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