Live-in Relationship या शादी, क्या है बेहतर? सदगुरु ने बताया दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर

आज के समय में लिव-इन रिलेशनशिप यानी बिना शादी के साथ रहने का चलन तेजी से आम होता जा रहा है। एक समय था जब समाज में इस तरह के रिश्तों को स्वीकार नहीं किया जाता था। ऐसे जोड़ों को सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ता था और कई बार उन्हें किराए पर घर तक नहीं मिलता था। लेकिन समय के साथ इसे कानूनी मान्यता मिली और अब इसे विवाह के विकल्प के रूप में भी देखा जाने लगा है। ऐसे में सवाल उठता है कि शादी और लिव-इन रिलेशनशिप में बेहतर क्या है? इस सवाल पर आध्यात्मिक गुरु सदगुरु ने अपनी राय रखी है।

क्या कहते हैं सदगुरु?

आध्यात्मिक गुरु सदगुरु के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप विवाह से बेहतर नहीं है। एक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि शादी और साथ रहने के रिश्ते में सबसे बड़ा अंतर प्रतिबद्धता का होता है। विवाह में वादा और स्थायित्व होता है, जबकि लिव-इन में इसकी कमी दिखाई देती है।

उनके मुताबिक, बिना प्रतिबद्धता के साथ रहना रिश्ते के लिए ठीक नहीं है। जब दो लोग एक-दूसरे के करीब आते हैं, तो उनके बीच सम्मान और जिम्मेदारी की भावना भी होनी चाहिए। अगर रिश्ते में यह सोच हो कि जब मन किया साथ रहेंगे और जब चाहा अलग हो जाएंगे, तो इससे दूसरे व्यक्ति के प्रति सम्मान कम हो जाता है।

विवाह और लिव-इन रिलेशनशिप में क्या है अंतर?

विवाह और साथ रहने के अंतर को समझाते हुए सदगुरु ने कहा कि प्रकृति ने विवाह जैसी व्यवस्था इसलिए बनाई, ताकि मानव समाज आगे बढ़ सके। उनके अनुसार, पुरुष और महिला के बीच अंतर केवल शारीरिक स्तर पर होता है। समाज ने अपनी जरूरतों के अनुसार इस रिश्ते को एक संस्था का रूप दिया, ताकि परिवार और बच्चों का पालन-पोषण एक स्थिर वातावरण में हो सके।

उन्होंने कहा कि जीवन के एक निश्चित दौर तक शारीरिक जरूरतें काफी मजबूत होती हैं, लेकिन समय के साथ उनका प्रभाव कम हो जाता है। इसके बावजूद विवाह को जीवन का जरूरी हिस्सा मान लिया गया है, इसलिए इसके बिना कुछ अधूरा महसूस होता है।

सदगुरु ने यह भी माना कि हर समाज अपने तरीके से लोगों की सोच को प्रभावित करता है। ऐसे में इंसान को सामाजिक सोच से आगे बढ़कर खुद समझने की जरूरत है।

रिश्तों में किस वजह से होते हैं झगड़े?

आजकल कई लोग विवाह को बंधन मानकर उससे दूर भागते हैं और इसे स्वतंत्रता का नाम देते हैं। लेकिन सदगुरु के अनुसार, अस्थिर रिश्ते लोगों के भीतर असुरक्षा की भावना बढ़ा सकते हैं।

पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां रिश्तों में अनिश्चितता के कारण भावनात्मक तकलीफ बढ़ी है। उनका मानना है कि झगड़े केवल किसी व्यवस्था की वजह से नहीं होते, बल्कि व्यक्ति की अधूरी समझ और अपरिपक्वता भी इसकी वजह होती है।

विवाह हो या लिव-इन, मन की स्थिरता जरूरी

सदगुरु के मुताबिक, दुनिया में कोई भी व्यवस्था पूरी तरह सही या गलत नहीं होती। हर व्यवस्था का इस्तेमाल अच्छे और बुरे, दोनों तरीकों से किया जा सकता है। असली बात यह है कि व्यक्ति उस व्यवस्था को किस तरह जीता है।

चाहे विवाह हो या लिव-इन रिलेशनशिप, सबसे जरूरी मन की स्थिरता है। विवाह आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक आधार देता है। इसलिए ज्यादातर लोगों के लिए यह सहायक साबित होता है।

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