क्यों भारतीय परिवार चुन रहे हैं अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा? भविष्य को संवारने की नई सोच

भारत में यह बदलाव एक नई क्रांति का रूप ले रहा है, जहां परंपरागत शिक्षा को ग्लोबल दृष्टिकोण से जोड़कर बच्चों को भविष्य के लिए तैयार किया जा...

आज से दो दशकों पहले तक, अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों का नाम भी कुछ खास परिवारों तक सीमित था, लेकिन अब भारत में ये स्कूल न सिर्फ बढ़ते जा रहे हैं, बल्कि एक पूरी नई दिशा भी तय कर रहे हैं। देश भर के माता-पिता अब अपने बच्चों को भारतीय बोर्ड की पारंपरिक शिक्षा से बाहर निकालकर एक ग्लोबल कैरियर की ओर भेजने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं। इस बदलाव ने पूरे शिक्षा क्षेत्र को नया आकार दिया है।

भारत में अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों की वृद्धि!

भारत में अब 972 अंतर्राष्ट्रीय स्कूल हैं, और ये आंकड़ा 2019 में 884 से बढ़कर अब 10% तक बढ़ चुका है। केवल 5 साल में इतनी तेज़ी से वृद्धि, ये बताता है कि अब माता-पिता अपने बच्चों को एक ग्लोबल शिक्षा की ओर धकेल रहे हैं। ये वृद्धि केवल मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में भी ये स्कूल अपनी जड़ें मजबूत कर रहे हैं। महाराष्ट्र में 210 स्कूल हैं, कर्नाटका, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्य भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं।

क्यों बढ़ रहे हैं अंतर्राष्ट्रीय स्कूल?

अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों का आकर्षण केवल उनका पाठ्यक्रम नहीं है, बल्कि वो बच्चों को जो अनुभव और ग्लोबल एक्सपोज़र देते हैं, वह एक नया कारक बन चुका है। छोटे क्लास रूम साइज, इंटरडिसिप्लिनरी अप्रोच, और खुद पर आधारित सीखने की तकनीक माता-पिता को आकर्षित कर रही है। “ये स्कूल सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि जीवन के असल अनुभवों से भी बच्चों को तैयार करते हैं,” कहते हैं कुणाल दलाल, MD, JBCN एजुकेशन।

ग्लोबल करियर की आकांक्षा और बढ़ते हुए माता-पिता के आय स्तर ने यह तय कर दिया है कि बच्चों को एक ऐसी शिक्षा दी जाए जो उन्हें पूरी दुनिया में कहीं भी प्रतिस्पर्धा करने का हौसला दे।

यह बदलाव केवल शैक्षिक नहीं, सामाजिक भी है!

अब अंतर्राष्ट्रीय स्कूल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि एक समाजिक स्टेटस सिम्बल बन चुके हैं। कुछ साल पहले जो स्कूल एक बाहरी विचारधारा के रूप में आते थे, आज वो भारतीय समाज का हिस्सा बन चुके हैं। शिक्षा को अब केवल ज्ञान के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रतिष्ठा के रूप में देखा जाने लगा है। “अब चार लाख रुपये की फीस देने में कोई संकोच नहीं करता, बस स्कूल का नाम और ब्रांड सही होना चाहिए,” कहते हैं शिक्षा विशेषज्ञ फ्रांसिस जोसेफ।

आधुनिक भारत का नया शिक्षा मॉडल

जो पहले सिर्फ एक ग्लोबल ट्रेंड था, अब वह भारतीय शिक्षा का अहम हिस्सा बन चुका है। चाहे वह शिक्षा का स्तर हो, या फिर शैक्षिक मॉडल, अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों में हर बात बदल रही है। अब 60-70% छात्र जो इन स्कूलों से पढ़ाई करते हैं, वे अपनी कॉलेज की पढ़ाई भारत में ही करते हैं। यह दिखाता है कि इन स्कूलों ने भारतीय शिक्षा को पूरी तरह से अपनाया है, और भारत में ही ग्लोबल टैलेंट तैयार कर रहे हैं।

क्या है इस बदलाव का रहस्य?

इस शिक्षा के बड़े बदलाव का कारण सिर्फ शिक्षा की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी रणनीतियाँ भी हैं। अब स्कूल एक साथ दो बोर्ड चलाने लगे हैं — भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय। इससे एक ही परिसर में विभिन्न समाजिक वर्गों को अपनी सेवा दी जाती है। “अब यह सिर्फ शिक्षा का व्यवसाय नहीं रहा, बल्कि एक बड़ा व्यापार मॉडल बन चुका है,” कहते हैं जोसेफ।

बदलते हुए भारत में, अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों के जरिए आने वाली पीढ़ी के लिए यह एक सुनहरा मौका है — एक ऐसा मौका, जो उन्हें दुनिया भर में कहीं भी सफल होने के लिए तैयार करेगा।

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