
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि कोई भी कर्मचारी, जो किसी एजेंसी के जरिए अनुबंध पर नियुक्ति पाता है, वह सरकारी महकमों और निकायों के नियमित कर्मचारियों के समान वेतन, भत्ते और अन्य लाभ का दावा नहीं कर सकता। शीर्ष अदालत ने इस मामले में स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरी एक सार्वजनिक संपत्ति है, और इसके लिए हर नागरिक को आवेदन करने का अधिकार है।
बता दें, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इस फैसले में कहा कि सरकारी महकमों में नियमित नियुक्तियां पारदर्शी प्रक्रिया के तहत की जाती हैं, जिसमें सभी योग्य उम्मीदवारों को समान अवसर मिलता है। इसके विपरीत, एजेंसी या ठेकेदार के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों का चयन उनके विवेक पर निर्भर होता है, और इस कारण इन दोनों श्रेणियों के बीच अंतर है।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा 2018 में पारित किए गए फैसले को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में, नगर निगम के लिए अनुबंध पर रखे गए कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समान वेतन और भत्ते देने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को खारिज कर दिया और कहा कि नियमित और अनुबंध कर्मचारियों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है, ताकि नियुक्ति के विभिन्न तरीकों (स्थायी, अनुबंध और तदर्थ) की पवित्रता बनी रहे।
बता दें, पीठ ने कहा कि राज्य प्राधिकार के तहत नियुक्ति एक सार्वजनिक संपत्ति है और यह किसी भी तरह के पक्षपात या बाहरी प्रभाव से मुक्त होनी चाहिए। नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी और योग्यता आधारित होती है, जिससे सभी योग्य उम्मीदवारों को समान अवसर मिलता है।
बता दें, यह मामला आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में स्थित नंदयाल नगरपालिका परिषद से जुड़ा था। यहां सफाई कर्मचारियों को ठेकेदार के जरिए नियुक्त किया गया था, और समय-समय पर ठेकेदार बदलते रहे थे। इस संबंध में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 2018 में फैसला सुनाया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अब रद्द कर दिया।









