वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी का ब्लॉग ‘यूपीनामा’, गठबंधन के सहारे भाजपाई विजय रथ को रोकने की रणनीति

चुनाव दर चुनाव भारतीय जनता पार्टी से पस्त हो रहे विपक्ष ने इस बार के यूपी चुनावों में एक बार फिर गठजोड़ के सहारे मुकाबले की रणनीति बनायी है। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी के हिसाब से सबसे मारक कहा जाने वाला सपा-बसपा का गठबंधन भी चमत्कार दिखाने में विफल रहा था। इस मर्तबा वैसा तो नहीं, पर उस जैसा ही कुछ कर एक बार फिर भाजपा को घेरने की कवायद शुरु हो गयी है। यूपी में भाजपा के मुकाबिल सबसे प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने बड़ों को छोड़ छोटे दलों के साथ गठबंधन करने की मुहिम शुरु की है और उसे बहुत हद तक कामयाबी भी हासिल हुई है।

चुनाव दर चुनाव भारतीय जनता पार्टी से पस्त हो रहे विपक्ष ने इस बार के यूपी चुनावों में एक बार फिर गठजोड़ के सहारे मुकाबले की रणनीति बनायी है। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी के हिसाब से सबसे मारक कहा जाने वाला सपा-बसपा का गठबंधन भी चमत्कार दिखाने में विफल रहा था। इस मर्तबा वैसा तो नहीं, पर उस जैसा ही कुछ कर एक बार फिर भाजपा को घेरने की कवायद शुरु हो गयी है। यूपी में भाजपा के मुकाबिल सबसे प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने बड़ों को छोड़ छोटे दलों के साथ गठबंधन करने की मुहिम शुरु की है और उसे बहुत हद तक कामयाबी भी हासिल हुई है। दूसरी ओर एंटी इनकम्बेंसी और अन्य नकारात्मक कारकों को शिथिल करने के लिए मौजूदा चैंपियन भाजपा अपने बड़े चेहरों, संसाधनों और संगठन की विशालता का इस्तेमाल एक-एक क्षेत्र में कितना बेहतर किया जाए, इस योजना को मूर्तरूप देने की बड़ी कसरत कर रही है।

गौरतलब है कि भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनावों में छोटे दलों से गठजोड़ करके ही नया इतिहास गढ़ा था और तीन चौथाई बहुमत की सरकार दशकों बाद उत्तर प्रदेश को मिली। इस बार सपा की कवायद कुनबे को उससे भी बड़ा करने की है। भाजपा भी पीछे नहीं है और उसकी लगातार छोटे दलों से गठजोड़ की कसरत चल रही है। अभी के गणित में जहां भाजपा के पास अपना दल (अनुप्रिया पटेल) और निषाद पार्टी हैं तो सपा के पास पांच दलों का साथ हो चुका है।

कृषि कानूनों की वापसी के एलान के बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश में चमत्कार की आस लगाए बैठे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) का रवैया निराश कर देने वाला रहा है। अंदरखाने कानून वापसी के बाद रालोद के साथ तालमेल की बातचीत शुरु कर चुकी भाजपा के लिए जयंत चौधरी व सपा मुखिया अखिलेश यादव की मुलाकात और उसके बाद दोनों केउत्साह से बरे ट्वीट दिल तोड़ देने वाले रहे हैं। हालांकि अभी दोनो दलों के बीच गठबंधन को औपचारिक स्वरुप नहीं दिया गया है पर सीटों से लेकर चुनाव प्रचार तक बहुत कुछ तय हो गया है। खुद रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने कहा इसी महीने के आखिर तक गठबंधन का एलान कर दिया जाएगा। रालोद के साथ गठबंधन की आस के परवान पर न चढ़ने और बदलते घटनाक्रम के बाद भाजपा के लिए पश्चिम उत्तर प्रदेश में जरुर चिंता बढ़ी है। भाजपा के बड़े नेताओं का एक धड़ा तो यहां तक कह रहा है कि अगर कुछ सकारात्मक नहीं होना था तो साल भर तक लटकाने के बाद कृषि कानून वापस ही क्यों लिए गए हैं।

कृषि कानून वापस लेने के बाद भाजपा को पश्चिम उत्तर प्रदेश में समीकरण बदले और सब कुछ पहले जैसा बेहतर हो जाने की उम्मीद बंधी थी। रालोद मुखिया जयंत चौधरी को साधा जा रहा था और कहा जाता है कि उनसे भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार अमित शाह की एक मुलाकात भी हो चुकी थी। भाजपा के ही कई नेता अपने अपने चैनल से भी रालोद से तालमेल की संभावनाए तलाशने में जुटे थे। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की तर्ज पर पश्चिम यूपी में भी भाजपा को जाटों को साधने की आस थी और कृषि कानून की वापसी इसकी राह आसान करने वाली दिख रही थी। पश्चिम यूपी में भाजपा के साथ पहले भी रालोद रह चुकी है और एक बार फिर से साथ आने पर पार्टी के लिए बीते कई सालों से अजमाया जा चुका जाट सहित अन्य जातियों का समीकरण बन जाने की उम्मीद थी।

कृषि कानूनों की वापसी के बाद लखनऊ में हुयी महा पंचायत में पश्चिम के किसानों की बड़ी तादाद में शिरकत व नेताओं के तीखे तेवर ने मुश्किलें पैदा कर दी थीं। बाताया जाता है पंचायत में जिस तरह से किसान नेताओं ने आंदोलन को जारी रखने और सरकार के सामने नयी चुनौतियां पेश करने का एलान किया उसने रालोद को भी सरकार के विरोध में ही बने रहने को मजबूर कर दिया। महापंचायत के अगले ही दिन रालोद मुखिया ने अखिलेश से बात कर यह साफ संकेत दे दिया कि उनका और सपा का गठबंधन होने जा रहा है।

जहां पहले सपा और रालोद के बीच सीटों की मांग को लेकर गतिरोध नजर आ रहा था और बनती हुयी बात बार बार बिगड़ रही थी वहीं इस बार सबकुछ आसानी से तय होता दिखा। पहले रालोद की पश्चिम यूपी में कम से कम 60 सीटों पर थी और सपा उसे महज 30 सीटें देने पर राजी थी। मंगलवार को अखिलेश और जयंत की मुलाकात के बाद साफ हो गया कि रालोद 36 सीटों पर ही मान जाएगी। इन 36 सीटों में से भी 6 सीटों पर सपा के प्रत्याशी रालोद के सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे। इससे पहले 2018 के मुजफ्फरनगर लोकसभा के उपचुनाव में यह प्रयोग हो चुका है जब सपा प्रत्याशी तब्बसुम हसन ने रालोद के हैंडपंप चुनाव निशान पर लड़ा था और सफलता पायी थी। दोनो नेताओं की बातचीत में सपा ने रालोद को पूर्वी यूपी में भी कम से कम दो सीटें देने का प्रस्ताव दिया है जिसे जयंत चौधरी ने खुशी खुशी मान लिया है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में दलितों के बीच असर रखने वाले भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद रावण से भी सपा मुखिया ने बातचीत के रास्ते खोल दिए हैं। रविवार को ही दोनों की मुलाकात भी हुयी है और माना जा रहा है देर सबेर उनका भी साथ अखिलेश को मिलेगा। रावण के साथ आने से सपा के रालोद के समर्थक वर्ग जाटों के साथ ही जाटवों का साथ भी मिलने की उम्मीद है।

राजनैति विश्लेषक बताते हैं कि रालोद-सपा के गठजोड़ पर मुहर लगने के बाद साफ है कि भाजपा के लिए पश्चिम यूपी में कुछ भी आसान नहीं हुआ है। यहां तक कि अभ तो कृषि कानूनों की वापसी का रत्ती भर लाभ भाजपा को मिलता नहीं दिख रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि जाटों के दिमाग से किसी भी बात को आसानी से निकाल पाना संभव नहीं है। मुजफ्फरनगर में 2013 के दंगों के बाद जाट रालोद छोड़ा कर भाजपा की तरफ गए थे तो फिर तीन चुनाव 2014, 2019 के लोकसभा व 2017 विधानसभा मे उनकी वापसी नहीं हुयी। रालोद के तत्कालीन मुखिया अजित सिंह और बेटे जयंत चौधरी तक चुनाव हारे। अब किसान आंदोलन के बाद वो फिर से रालो की ओर कुछ हद तक लौटे हैं और मुसलमानों के साथ उनका परंपरागत गठजोड़ फिर से कायम हुआ है तो आसानी से खत्म नहीं होने वाला है।

पश्चिम के गणित से इतर पूर्वी व मध्य यूपी जहां जातियों व खासकर पिछड़ी जातियों की तादाद काफी है, वहां के लिए सपा के दरवाजे छोटे दलों के लिए खुले हैं। अब तक सपा पूर्वी यूपी में प्रभावी ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव राजभर भारतीय समाज पार्टी, लोनिया चौहान बरादरी में असर रखने वाली जनवादी सोशलिस्ट पार्टी, मौर्या-काछी-कुशवाहा जातियों में लोकप्रिय महान दल, कुर्मियों में प्रभावी अपना दल के एक कृष्णा पटेल धड़े से गठबंधन कर चुकी है। पिछड़ी जातियों में असर रखने वाले अन्य दलों से बातचीत जारी है।

उधर भाजपा जातीय असर रखने वाले दलों को साथ लेकर चलने के सपा के कार्ड को नाकाम करने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण को तेज करने में जुटी है। हालांकि अपना दल व निषाद पार्टी के साथ समझौते के बाद भाजपा को पिछड़ों में बड़े वर्ग के फिर अपने ही साथ रहने की उम्मीद है पर इसी के साथ वह अब्बाजान, मियांजान और जिन्ना जैसे जुमलों के सहारे धार्मिक भावनाओं को उबाल पर लाने में जुटी है।

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