वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी का ब्लॉग यूपीनामा : यूपी के मोर्चे पर खुद इसलिए डटे मोदी

देश की राजनीति के सबसे उर्वर प्रदेश यानी उत्तर प्रदेश में मौसम की सर्दी ज्यों ज्यों बढ़ रही है, राजनीति की गर्मी उससे वैसे ही टक्कर ले रही है। गत विजेता भारतीय जनता पार्टी को सीधी टक्कर देते दिख रहे समाजवादी अखिलेश यादव की यात्राओं में उमड़ रही भीड़ का जवाब देने के लिए सत्ता पक्ष ने अपनी रणनीति में फौरी बदलाव किया है और दिल्ली की गद्दी के लिए जरुरी यूपी की सत्ता के समर में अग्रिम मोर्चे पर अब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डट गए हैं।

करो या मरो की इस जंग में तमाम क्षत्रपों को पीछे छोड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की कमान संभाल ली है। उनके अब तक 6 दौरे हो चुके हैं और 4 अगले दस दिनों में होने वाले हैं। इस समय उन्हें यूपी के लिए सत्तारूढ़ दल का कमांडर-इन-चीफ कहना ही उपयुक्त होगा।करीब दो महीने बाद पांच राज्यों यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं। लेकिन प्रधानमंत्री का सारा फोकस यूपी पर है। मोदी के दौरे ने उस तथ्य को फिर से उजागर कर दिया है कि केंद्र में सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही तय होता है।

दरअसल मोदी आचार संहिता लागू होने से पहले विकास पर फोकस वादों, योजनाओं के शिलान्यास की बारिश यूपी में कर देना चाहते हैं। चुनाव आयोग जनवरी में किसी समय चुनाव आचार संहिता लागू कर देगा और तारीखों का ऐलान कर देगा।चुनाव आयोग की टीम इन पांचों प्रदेशो में तैयारी की समीक्षा करने के लिए निकल चुकी है। टीम ने अब तक पंजाब सहित कुछ राज्यों का दौरा पूरा कर लिया है और यूपी उसके लिए सबसे आखिरी पड़ाव होगा। आयोग की तैयारी और उसके किसी एलान से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी बिनी वक्त गवांए यूपी को ज्यादा से ज्यादा मथ लेना चाहते हैं। समझा जाता है कि चुनाव की तारीखों की घोषणा के ठीक पहले, संभवतः जनवरी के दूसरे हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक बड़ा कार्यक्रम उत्तर प्रदेश में होगा।

यूपी में अब तक हुए चुनावों में बीजेपी को सबसे ज्यादा बेहतर परिणाम देने वाले पश्चिम की जगह इस बार पार्टी की खास नजर पूर्वी उत्तर प्रदेश पर है।इस क्षेत्र के 28 जिले मिलकर पूर्वी उत्तर प्रदेश बनाते हैं। इसमें करीब 165 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के 128 विधायक पूर्वी उत्तर प्रदेश से चुने गए थे। लेकिन 2014 में जो मोदी लहर थी, उसके मुकाबले 2019 के लोकसभा चुनाव में उसका असर कम रहा और पार्टी कई विधानसभा क्षेत्रों में हार गई।

हालांकि यह नुकसान बड़ा नहीं था। लेकिन नुकसान तो नुकसान है। 2019 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि पार्टी सिर्फ 274 सीटों पर ही निर्णायक भूमिका में रही, जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 315 सीटों पर जीती थी। मोदी इस तथ्य से वाकिफ हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में थोड़ी से मेहनत से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। कम से कम काशी विश्वनाथ कारीडोर के उद्घाटन के बाद जो समा बंधा है उससे तो उम्मीद और भी ज्यादा बंधती है।

वास्तव में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के साथ काशी विश्वनाथ कारीडोर का भव्य स्वरूप, विंध्याचल में माँ विंध्यवासिनी शक्तिपीठ का नवीनीकरण और इसी बीच मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि की चर्चाओं के जरिए भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनाव में बृहत्तर हिन्दू एकता की नई रणनीति तैयार की है जिसका प्रारम्भिक असर भी दिखना शुरू हो गया है। पिछड़े और अगड़े हिंदुओं को जोड़ने के साथ प्रधानमंत्री द्वारा विकास परियोजनाओं की शुरुआत कराकर भाजपा ने यूपी में अखिलेश यादव का असर हल्का करने की योजना तैयार की है।

फिलहाल नरेंद्र मोदी राज्य में जिम्मेदार अग्रज की भूमिका निभाते हुए रण में उतर पड़े हैं। अक्टूबर में अपने लोकसभा क्षेत्र वाराणसी से उन्होंने इसकी शुरुआत की थी। इसके बाद वो सुल्तानपुर के कूड़ेभार में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करने पहुंचे। कुशीनगर में अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे का उद्घाटन किया। इसके बाद वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृहनगर गोरखपुर में खाद कारखाने और एम्स का लोकार्पण करने पहुंचे।

इसी क्रम में एक बार फिर वो दिसंबर के ही महीने में दोबारा वाराणसी पहुंचे जहां उन्होंने अपने संबोधन में औरंगजेब की याद दिलाई। मोदी के इस संबंध से बेचारे जिन्ना को राहत मिली होगी, जिनकी गूंज काफी दिनों से सुनाई दे रही थी।पहले चरण में काफी कुछ कवर करने के बाद मोदी की पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा 18 दिसम्बर से फिर शुरू हो गयी है। इस बार उनका कार्यक्रम 28 दिसम्बर तक चलेगा। इस दौरान उन्होंने 18 दिसम्बर को शाहजहांपुर में गंगा एक्सप्रेसवे का शिलान्यास और रैली करने के बाद 21 दिसम्बर को प्रयागराज में रैली करते हुए 23 दिसम्बर को फिर से काशी में एक कार्यक्रम में शामिल होते हुए 28 दिसम्बर को कानपुर में मेट्रो का उद्घाटन करेंगे।

जाहिर है कि इन तमाम जगहों की कवरेज सीधे टीवी चैनलों पर होगी और मोदी घोषणाओं की बारिश में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे। दरअसल, पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन की वजह से भाजपा की स्थिति राजनीतिक विश्लेषक अच्छी नहीं मान रहे हैं। अभी कल यानी 16 दिसम्बर को ही जिस तरह सिसौली में राकेश टिकैत का स्वागत हुआ और उसमें भीड़ उमड़ी, वो जनता के मूड को बता रही है।हालांकि पिछले कई चुनावों में भाजपा जाट मतदाताओं को अपने पाले में लाने में सफल रही है। लेकिन राकेश टिकैत ने फिलहाल बाजी पलट दी है।


टिकैत जाटों की बालियान खाप से आते हैं। इस समय जाटों की सारी खाप टिकैत परिवार के साथ जुड़ चुकी है। इसका नजारा 5 सितम्बर को ऐतिहासिक मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत में दिखा था। इस महापंचायत में हिन्दू-मुस्लिम एकता के नारे भी लगे थे। पश्चिमी यूपी में जयंत चौधरी की पार्टी रालोद भी बेहतर स्थिति में नजर आ रही है। उसका सपा से समझौता हो चुका है।

इस तरह पश्चिमी यूपी में भाजपा के लिए फिलहाल विपरीत परिस्थितियां बनी हुई हैं। इसीलिए मोदी पूर्वी उत्तर प्रदेश में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते। मोदी ही नहीं यूपी की गलियों में गृह मंत्री अमित शाह से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी घूम रहे हैं।हालांकि लीविंग नो स्टोन अनटच्ड की तर्ज मोदी यूपी को किसी और के भरोसे न छोड़ कर पूरी कमान अपने ही हाथों में रख रहे हैं। यह बात दीगर है कि सहयोगी की भूमिका में इस बार मुख्यमंत्री योगी के बराबर ही भाजपा की पिछली विजय के नायक उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य उनके बगलगीर हैं।

ध्यान रहे, इस चुनाव में अगर भाजपा बृहत्तर हिन्दू एकता के जरिए धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास करेगी तो मुख्य प्रतिद्वंद्वी अखिलेश यादव बड़े मुस्लिम समर्थन के साथ पिछड़े वर्ग की एकता पर फोकस कर रहे हैं। मतलब परंपरागत समर्थक यादवों के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को जोड़ने की रणनीति । इसके जवाब में भाजपा नेतृत्व ने एक बार फिर केशव प्रसाद मौर्या को पूरी अहमियत और शक्ति के साथ मैदान में उतार दिया है।

याद रहे इन्ही केशव मौर्या के नेतृत्व में भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी जिसमे पिछड़ी जातियों के साथ ही ब्राह्मणों का बड़ा समर्थन शामिल था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तमाम नीतियों के चलते न सिर्फ ब्राह्मण अपितु अन्य पिछड़ी जातियों में भी इस बार नाराजगी बताई जा रही है।

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