127 साल पुरानी नीलगिरि माउंटेन रेलवे: ऊटी की ‘टॉय ट्रेन’ जो इतिहास, प्रकृति और इंजीनियरिंग का अनोखा संगम है

The 127-year-old Nilgiri Mountain Railway. तमिलनाडु की प्रसिद्ध नीलगिरि माउंटेन रेलवे (Nilgiri Mountain Railway – NMR), जिसे आमतौर पर ऊटी टॉय ट्रेन के नाम से जाना जाता है, भारत की सबसे अनोखी और ऐतिहासिक रेल लाइनों में से एक है। वर्ष 1899 में शुरू हुई यह हिल रेलवे आज भी अपनी इंजीनियरिंग क्षमता और प्राकृतिक सुंदरता के लिए दुनिया भर में जानी जाती है। यही वजह है कि वर्ष 2005 में यूनेस्को ने इसे ‘माउंटेन रेलवेज ऑफ इंडिया’ के तहत विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) का दर्जा दिया।

नीलगिरि की धुंध से ढकी पहाड़ियों, हरे-भरे चाय बागानों और खूबसूरत घाटियों के बीच से गुजरने वाली यह ट्रेन यात्रियों को एक अनोखा अनुभव देती है। संकरी पटरियों पर धीरे-धीरे चलती भाप इंजन की आवाज यात्रियों को मानो पुराने दौर की यादों में ले जाती है।

इस रेलवे लाइन का विचार सबसे पहले 1854 में ब्रिटिश शासन के दौरान सामने आया था। उस समय मेट्टूपालयम से पहाड़ियों की ओर रेलवे लाइन बनाने का प्रस्ताव रखा गया था। जब मद्रास–कोयंबटूर–मेट्टूपालयम रेल लाइन 1873 में शुरू हुई, तब नीलगिरि जिले के इंजीनियर JLL मोरेंट ने पहाड़ों तक रेलवे पहुंचाने की संभावना पर काम शुरू किया।

नीलगिरि माउंटेन रेलवे का निर्माण अलग-अलग चरणों में पूरा हुआ। मेट्टूपालयम से कुन्नूर तक 27.34 किलोमीटर लंबी लाइन 15 जून 1899 को शुरू हुई। इसके बाद कुन्नूर से फर्नहिल तक 17.48 किलोमीटर का हिस्सा 15 सितंबर 1908 को खोला गया और फर्नहिल से उदगमंडलम (ऊटी) तक 1.79 किलोमीटर का अंतिम हिस्सा 15 अक्टूबर 1908 को शुरू किया गया

मेट्टूपालयम से उदगमंडलम के बीच कुल 16 सुरंगें, 257 पुल और 209 घुमावदार मोड़ हैं, जो इस रेलवे को इंजीनियरिंग का अनोखा नमूना बनाते हैं। यह भारत की एकमात्र ‘रैक एंड पिनियन’ रेलवे प्रणाली है और एशिया की सबसे खड़ी रेलवे लाइनों में भी शामिल है। यह ट्रेन करीब 46 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 326 मीटर से 2203 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचती है

मेट्टूपालयम से कुन्नूर के बीच ट्रेन को खींचने के लिए खास X क्लास स्टीम लोकोमोटिव का इस्तेमाल किया जाता है। पहले ये इंजन स्विट्जरलैंड से आयात किए जाते थे, लेकिन अब इन्हें तिरुचिरापल्ली के गोल्डन रॉक वर्कशॉप में बनाया जाता है। वहीं कुन्नूर से उदगमंडलम के बीच ट्रेन को डीजल लोकोमोटिव खींचते हैं। इन इंजनों की देखरेख कुन्नूर स्थित स्टीम लोको शेड में की जाती है।

नीलगिरि माउंटेन रेलवे के पास फिलहाल 27 यात्री कोच हैं, जिनसे नियमित ट्रेन सेवाएं चलाई जाती हैं। इसके अलावा 13 वैगन भी उपलब्ध हैं, जिनका इस्तेमाल रेलवे ट्रैक और अन्य इंजीनियरिंग कार्यों के लिए जरूरी सामग्री ढोने में किया जाता है। इन कोच और वैगनों की देखरेख मेट्टूपालयम के कैरिज और वैगन डिपो में की जाती है।

इस रेलवे की सबसे खास बात यह है कि इसके कई मूल ढांचे आज भी वैसे ही संरक्षित हैं, जैसे स्टेशन, सेमाफोर सिग्नल सिस्टम, लोकोमोटिव और कोच। यही कारण है कि यह रेलवे एक जीवित विरासत प्रणाली के रूप में आज भी संचालित हो रही है।

इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित और बढ़ावा देने के लिए 10 अक्टूबर 2015 को मेट्टूपालयम में नीलगिरि माउंटेन रेलवे म्यूजियम खोला गया। इसके बाद 15 जून 2018 को उदगमंडलम में हेरिटेज म्यूजियम भी शुरू किया गया, जहां इस रेलवे के इतिहास और तकनीक से जुड़ी जानकारी प्रदर्शित की जाती है।

वर्तमान में मेट्टूपालयम–उदगमंडलम–मेट्टूपालयम के बीच रोजाना ट्रेन सेवा चलाई जाती है। इसके अलावा कुन्नूर और उदगमंडलम के बीच रोजाना तीन जोड़ी ट्रेनें संचालित होती हैं। गर्मियों और छुट्टियों के दौरान इस रूट पर विशेष ट्रेनें भी चलाई जाती हैं, जिससे पर्यटकों को सुविधा मिलती है।

नीलगिरि माउंटेन रेलवे के मेट्टूपालयम, कुन्नूर और उदगमंडलम रेलवे स्टेशन को ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’ के तहत विकसित किया जा रहा है। इस योजना में स्टेशन के ऐतिहासिक स्वरूप और सौंदर्य को बरकरार रखते हुए आधुनिक सुविधाएं जोड़ी जा रही हैं।

इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 मार्च को तिरुचिरापल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पांच नई ट्रेन सेवाओं को हरी झंडी दिखाएंगे, जिनमें दो अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनें भी शामिल हैं। इनमें नागरकोइल–चारलापल्ली अमृत भारत एक्सप्रेस दक्षिण तमिलनाडु को तेलंगाना से जोड़ेगी, जबकि पोडनूर–धनबाद अमृत भारत एक्सप्रेस कोयंबटूर के औद्योगिक क्षेत्र को पूर्वी भारत के कोयला और इस्पात क्षेत्र से सीधे जोड़ेगी।

इसके अलावा रामेश्वरम–मंगलुरु एक्सप्रेस, तिरुनेलवेली–मंगलुरु एक्सप्रेस और मयिलादुथुरै–तिरुवरूर–करैकुडी जैसी नई ट्रेन सेवाएं भी शुरू की जाएंगी, जिससे क्षेत्र के लोगों को बेहतर रेल संपर्क का लाभ मिलेगा।

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