भारतीय दर्शन में बहुत व्यापक है ‘राष्ट्र’ की व्यख्या, जानिए राष्ट्र के मुद्दे पर भारतीय दर्शन कैसे है पाश्चात्य दर्शन से भिन्न?

राष्ट्र और राष्ट्रवाद आजकल अधिकांश चर्चाओं के केंद्र में रह रहा है। राष्ट्र की परिभाषा हमेशा एक जैसी नहीं रही है। अलग-अलग विद्वानों और बौद्धिकों ने इसे अपने अपने ढंग से परिभाषित किया है। संभवतः राष्ट्र की परिभाषा देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर रही जिसे अलग-अलग व्यक्तित्वों द्वारा विभिन्न तरीकों से परिभाषित किया गया।

अगर हम भारतीय परिदृश्य में देखें तो सबसे पहले हम ‘ऋग्वेद’ में इसका संधान पाते हैं जहां राष्ट्र को संगम या मेल के अर्थ में परिभाषित किया गया है। ऋग्वेद की एक सूक्ति परिभाषा में ‘अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम’ यह बताती है कि देश, दिशाओं अथवा पृथ्वी को धारण करनेवाली शक्ति का नाम ही राष्ट्र है। यह शक्ति लोगों की हैं, आज के परिवेश में यह शक्ति आम आदमी के लिए परिभाष्य है।

यजुर्वेद की अगर एक सूक्ति की बात करें तो यहां ‘राष्ट्रदा राष्ट्रभ्ये दत्त’ नामक सूक्ति में इसे परिभाषित किया गया है। अब यहां दो चीजे सामने आती हैं और संदेह उत्पन्न उत्पन्न करती हैं। भारतीय वैदिक साहित्य और ग्रंथों में अधिकांशतः राष्ट्र शब्द ही प्रयुक्त हुआ है। अब तक यहां देश की कोई अवधारणा नहीं दी गई है या अगर देश का कहीं उल्लेख है तो वह नगण्य मात्र है। देश जहां किसी भूमि के अंश को परिभाषित करता है तो वहीं राष्ट्र की संकल्पना अपने आप में बहुत वृहद और व्यापक है।

देश जहां मात्र एक भूमि का टुकड़ा है तो वहीं राष्ट्र, भूमि के अंश के अलावा लोगों की संस्कृति, उनकी चिंतन परंपरा और उनके दर्शन ज्ञान का समावेश है। हमारे वैदिक साहित्यों ने जो राष्ट्र की परिभाषा गढ़ी है उसमें इसके रचयिताओं ने इसे केवल शासन सत्ता द्वारा नियंत्रित भूमि के हिस्से के रूप में नहीं दर्शाया है वरन् वे राष्ट्र के प्रति सभी लोगों की जागरूकता की कामना करते हैं। तभी तो वैदिक अवधारणा बताती है कि ‘वयं राष्ट्रे जागृमाय पुरोहिताः’ अर्थात हम सभी लोग राष्ट्र को जीवंत एवं जाग्रत बनाए रखेंगे। यह जागृति तभी आएगी जब राष्ट्र को लेकर समाज जगे।

यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि हम राष्ट्र की परिभाषा को पाश्चात्य चिंतकों के अनुसार पढ़ते हैं और उस आधार पर हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं वो समाज में मतभेद और मतभिन्नता के अलावा और कुछ नहीं देता। आखिर हम राष्ट्र की इतनी व्यापक परिभाषा को छोड़कर उन साहित्यकारों और चिंतकों के साहित्य का अध्ययन ही क्यों करते हैं जो राष्ट्र की संकल्पना को एक संकीर्ण और दबा हुआ स्वरूप प्रदान करते हैं?

पाश्चात्य साहित्यकार राष्ट्र की व्यापक व्याख्या को लैटिन भाषा के एक शब्द ‘नेशियो’ से व्युत्पन्न बताकर इसे बहुत संकीर्ण बना देते हैं। पाश्चात्य साहित्यकार बर्गेस राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लिखते हैं कि ‘भौगोलिक एकता वाले एक ही क्षेत्र में निवास करने वाली केवल एक ही नस्ल की जनसंख्या ही राष्ट्र है।’ अर्थात सीधे तौर पर एक राष्ट्र को लेकर इनकी समझ एक सीमाबद्ध भूमि में निवासरत जनसंख्या के अलावा और कुछ नहीं है।

ऐसे तमाम चिंतकों ने अपने-अपने ढंग से राष्ट्र की परिभाषा प्रस्तुत की है। भारतीय विमर्श में विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ टैगोर ने अपनी पुस्तक ‘गोरा’ में राष्ट्र के स्वरूप को ‘मां’ की छवि और उनके प्रकृति को व्यापकता देते हुए दर्शाया है।

उनकी यह पुस्तक गौरमोहन नामक पात्र पर आधारित है जो धार्मिक सहिष्णुता-असहिष्णुता और राष्ट्रवाद के दोहरे मापदंडों के बीच उभरते प्रेम के पागलपन में राष्ट्रीय गौरव पर लिखी गई एक अद्भुत कथा है। इसमें गौरमोहन उर्फ ‘गोरा’ के राष्ट्रवाद के माध्यम से इन्होंने समाज को एक सशक्त संदेश देने की कोशिश की है।

पुस्तक के एक प्रसंग में गोरा अपनी माता से बातचीत करते हुए वर्तमान परिवेश के लिए बहुत ही सटीक तरीके से राष्ट्र को परिभाषित करते हुए अपनी माता से कहता है कि “जिस मां को मैं खोजता फिर रहा था वह तो मेरे सामने कमरे में बैठी हुई हैं। तुम्हारी कोई जात नहीं है, तुम ऊंच-नीच का विचार नहीं करती, तुम घृणा नहीं करती-तुम केवल कल्याण की मूर्ति हो। तुम ही मेरा भारतवर्ष हो!”

गोरा की यह पंक्ति राष्ट्र को परिभाषित करने वाले तमाम अवधारणाओं को समेटे हुए है। यह पंक्ति तत्कालीन और वर्तमान समाज की संकीर्णताओं पर गंभीर प्रहार करती है। राष्ट्र की संकुचित परिभाषा गढ़ देने वाले लोगों के लिए यह पंक्ति एक करारा जवाब है। इसमें सामाजिक समरसता और सर्वसमावेशी समाज की झलक प्रतिबिंबित होती है। हालांकि यह बात भी स्वीकार करने योग्य है कि जब तक प्रत्येक नागरिक में राष्ट्र की भावना को जीवंत और जागृत रखने की एक सकारात्मक जागृति नहीं आएगी तब तक देश का हित नहीं हो सकता।

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