सुप्रीम कोर्ट ने IIT बॉम्बे से दलित छात्र के लिए सीट बना कर एडमिशन देने को कहा..

रिपोर्ट – अवैस उस्मानी

IIT बॉम्बे में एडमिशन के लिए तय समय में फीस नहीं भर पाने की वजह एडमिशन नही ले पाने वाले दलित छात्र के लिए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए संयुक्त सीट आबंटन प्राधिकरण को छात्र के लिए एक सीट निर्धारित करने का निर्देश दिया। बॉम्बे IIT को कहा 48 घंटे के भीतर प्रवेश देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा छात्र के साथ ही कोर्ट ने कहा कि छात्र के लिए अलग से सीट बनाई जाए। इसके लिए किसी दूसरे छात्र की सीट न ली जाए।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बीवी नागरत्न की पीठ ने निर्देश दिया छात्र को IIT बॉम्बे में आवंटित की जाए और इससे किसी अन्य छात्र के प्रवेश में बाधा न आए, अगर सीट खाली हो जाती है तो इस सीट का निर्माण नियमित रूप से प्रवेश के अधीन होगा। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत के सामने एक युवा दलित छात्र है जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के मुंबई में आवंटित एक महत्वपूर्ण सीट को खोने की कगार पर है, वह इलाहाबाद से खारगपुर फिर मुंबई और फिर दिल्ली आया।

मामले की सुनवाई के दौरान ऑथरिटी के वकील ने कोर्ट को बताया कि सभी सीटों को आवंटित किया जा चुका है, IIT में कोई भी सीट खाली नहीं है, ऐसे 7 अन्य और छात्र हैं जो फीस का भुगतान न करने के कारण एडमिशन लेने से चूक गए हैं, ऑथरिटी के वकील ने कहा कि कृपया अनुच्छेद 142 के तहत निर्देशों को पास करें ताकि हम एक सीट बना सकें और उस को आवंटित कर सकें। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ऑथरिटी से कहा कि आपको छात्र से मानवीय दृष्टिकोण से निपटना होगा, यह बस नौकरशाही है, आपको एक सीट बनाना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कई बार सीटें खाली रह जाती है, यह छात्र इस स्तिथि में नहीं है, वह एक दलित छात्र है और उसके पास पैसा नहीं है, जमीनी स्तर पर जो कुछ होता है, उस वास्तविकता को समझना चहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा आपके पास एक मजबूत तंत्र होना चाहिए, हर किसी के पास कई क्रेडिट कार्ड नहीं होते है, इतने लंबे समय तक वह IIT प्रवेश के लिए तैयारी करते हैं और छात्र प्रवेश से वंचित हैं, मेट्रोपोलिटन शहर के छात्र भी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में भी शामिल हो सकते है, ऐसी बाधाओं का सामना करने वाले छात्रों के लिए कुछ बफर होने चाहिए।

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी किया था कि अदालत को कभी-कभी कानून से ऊपर उठना चाहिए क्योंकि कौन जानता है कि आगे चलकर 10 साल बाद वह हमारे देश का नेता हो सकता है। प्रवेश परीक्षा में आरक्षित श्रेणी में 864वां रैंक हासिल करने वाले याचिकाकर्ता प्रिंस जयबीर सिंह की ओर से पेश वकील अमोल चितले ने कहा कि अगर उन्हें आईआईटी, बंबई में प्रवेश नहीं मिलता है, तो वह किसी अन्य आईआईटी संस्थान में भी दाखिला लेने को तैयार हैं।

याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता को आइआइटी, बांबे में सिविल इंजीनियरिंग सीट आवंटित की गई थी, लेकिन वह सीट शुल्क का भुगतान नहीं कर सके क्योंकि 27 अक्टूबर को उनका क्रेडिट कार्ड काम नहीं कर रहा था। वकील प्रज्ञा बघेल के माध्यम से दायर अपनी याचिका में, सिंह ने कहा कि अगले दिन, उसने अपनी बहन के पैसे भेजने के बाद सीट बुक करने की कोशिश की, लेकिन ऐसा नहीं कर सके। इसके बाद, उन्होंने आइआइटी प्रबंधन को कई ई-मेल लिखे और अधिकारियों को फोन किया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। तकनीकी समस्या की वजह से वह अपनी फीस नही भर सका। जिसकी वजह से उसे IIT बॉम्बे में प्रवेश नही मिल सका था।

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