
यूनाइटेड स्टेट्स हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव्स ने ताइवान के मुद्दे पर चीन को सख्त चेतावनी देने के लिए एक नए कानून को मंजूरी दी है। हाउस ने “PROTECT ताइवान एक्ट” को भारी बहुमत से पास किया, जिससे यह साफ हो गया है कि दोनों प्रमुख पार्टियां ताइवान को लेकर चीन के खिलाफ एकजुट हैं। यह एक्ट चीन को ताइवान पर दबाव बनाने से रोकने के उद्देश्य से लाया गया है।
बता दें, एक रिपोर्ट के अनुसार, इस बिल को फ्रैंक लुकास ने पेश किया और इसे 395 सदस्यों ने समर्थन किया, जबकि केवल 2 ने विरोध किया। इस प्रस्ताव में यूएस सरकार से यह मांग की गई है कि यदि बीजिंग का व्यवहार ताइवान की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था या जीवनशैली के लिए खतरा बनता है, तो अमेरिका चीन को प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से बाहर करने के लिए कदम उठाए। इनमें G20, बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स और फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड जैसी संस्थाएं शामिल हैं।
वहीं, लुकास ने कहा कि इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि यदि चीन ने ताइवान पर हमला किया तो उसे बड़े पैमाने पर आर्थिक और डिप्लोमैटिक नतीजे भुगतने होंगे। उन्होंने रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले के बाद अपनाए गए दंडात्मक उपायों का उदाहरण दिया और कहा कि जब भी तय नियमों का उल्लंघन होता है, ग्लोबल कम्युनिटी को सख्त जवाब देना चाहिए। उन्होंने साउथ चाइना सी में चीन के रवैये का हवाला देते हुए कहा कि वाशिंगटन को अब पहले से ज्यादा सख्त होना चाहिए।
बता दें, अगर चीन ताइवान पर हमला करने की कोशिश करता है, तो इस प्रस्ताव के तहत बैन और मल्टीलेटरल संस्थाओं में उसकी हिस्सेदारी को सस्पेंड करने जैसे कदम उठाए जाने की संभावना है।
रिपब्लिकन सांसद फ्रेंच हिल ने ताइवान रिलेशंस एक्ट के नियमों की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह एक्ट चीन को किसी भी हमले की कोशिश करने पर भारी डिप्लोमैटिक और फाइनेंशियल कीमत चुकाने का संकेत देता है। वहीं, डेमोक्रेट सांसद ग्रेग स्टैंटन ने भी यह बात दोहराई और कहा कि जिन सरकारों ने अपने पड़ोसियों को धमकी दी है, उन्हें इंटरनेशनल सिस्टम से लाभ उठाने का कोई अधिकार नहीं है।
वहीं, अब इस प्रस्ताव को सीनेट में पास होना है और अमेरिकी राष्ट्रपति की मंजूरी की आवश्यकता है, ताकि यह कानून बन सके। यदि यह पारित हो जाता है, तो यह चीन पर एक बड़ा दबाव बनाने वाला कदम साबित हो सकता है, खासकर ताइवान पर उसके बढ़ते दबाव के संदर्भ में।









