
अमेरिका ने भारत और रूस के बीच तेल आयात को लेकर अपने रुख में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। यह बदलाव तब हुआ जब भारत और यूरोपीय संघ ने शनिवार 27 जनवरी को ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के पीछे अमेरिका का दोहरा रवैया है, जिसका खुलासा किया गया है।
बता दें, अमेरिका पहले रूस से तेल खरीदने पर भारत की आलोचना कर रहा था, लेकिन अब भारत और EU के बीच हुए व्यापार समझौते के बाद उसने अपनी नीति में बदलाव किया है। अमेरिका का कहना था कि रूस से तेल खरीदने से वैश्विक सुरक्षा को खतरा हो सकता है, लेकिन अब स्थिति बदल गई है और अमेरिका के रुख में नरमी आई है।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच यह व्यापार समझौता वैश्विक आर्थिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते से भारत को अपने व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करने का मौका मिलेगा। साथ ही, यह अमेरिका के दबाव को भी कम करेगा, जो हमेशा भारत के रूस से तेल खरीदने पर आपत्ति करता रहा है।
विशेषज्ञों ने अमेरिकी नीति में इस बदलाव को ट्रंप के दोहरे मानक के रूप में पेश किया है। उनका कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने पहले रूस के साथ व्यापारिक संबंधों को लेकर भारत की आलोचना की थी, लेकिन अब भारत-यूरोपीय संघ के व्यापार समझौते के बाद उसी नीति को बदल दिया गया है। इस पर कई विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि अमेरिका का यह रवैया क्यों बदला।
भारत ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार ही अपने विदेश नीति और व्यापारिक निर्णयों को लेता है। भारत का कहना है कि उसे किसी भी देश के दबाव में आकर अपने फैसले नहीं लेने चाहिए, और इस मामले में भी उसने अपनी नीति में बदलाव नहीं किया है।
भारत और रूस के बीच तेल व्यापार को लेकर अमेरिकी रुख में बदलाव वैश्विक राजनीति और आर्थिक संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। अब यह देखना होगा कि भविष्य में इस मामले पर और क्या विकास होते हैं।









