
सर्दियों का मौसम आते ही, लोगों के मन में रोमांस की एक अलग ही लहर उठने लगती है। इसे “कफिंग सीजन” कहा जाता है, जिसमें सिंगल लोग ठंडी रातों में किसी रिश्ते की तलाश में निकल पड़ते हैं। ठंड से कांपती हड्डियों से आवाज निकलती है कि “गले लगा ले मुझे कोई, अपना बना ले मुझे कोई, वरना कहीं मैं मर जाउंगा इस ठंड में’, शायरों ने भी ठंड पर लिखा है कि ‘ठिठुरती रातों में तेरा साथ चाहिए…’ लेकिन क्या सच में सर्दियों में रिश्तों की तलाश बढ़ जाती है? और अगर हां, तो इसके पीछे वैज्ञानिक कारण क्या हो सकते हैं? आइए जानते हैं।
सर्दियों में पार्टनर की तलाश:
सर्दियों को रोमांस का मौसम माना जाता है क्योंकि ठंडी रातों में लोग एक दूसरे के साथ ज्यादा समय बिताना पसंद करते हैं। सैन होजे स्टेट यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजी प्रोफेसर क्रिस्टीन मा-केलम्स कहती हैं कि “कफिंग सीजन का मतलब यह है कि इंसानों की ‘मेटिंग बिहेवियर’ में मौसम का असर होता है।” हालांकि इस पर एकमत नहीं है, लेकिन इंटरनेट पर आंकड़े एक अलग कहानी बयां करते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सर्दियों में इंटरनेट पर पोर्न, डेटिंग साइट्स, और सेक्स वर्क से संबंधित सर्च की संख्या काफी बढ़ जाती है। 2012 के अध्ययन में भी पाया गया कि सर्दियों और गर्मियों में सर्च की यह वृद्धि आमतौर पर होती है।
डेटिंग ऐप्स पर बढ़ती एक्टिविटी:
आज के डिजिटल दौर में, डेटिंग ऐप्स पर स्वाइपिंग की रफ्तार सर्दियों में बढ़ जाती है। बंबल के आंकड़े बताते हैं कि नवंबर के आखिरी हफ्तों से फरवरी के बीच सबसे ज्यादा स्वाइपिंग होती है, यानी वैलेंटाइन्स डे के आस-पास नए रिश्तों की शुरुआत और टूटने की भी संभावना रहती है। किंसी इंस्टीट्यूट के जस्टिन गार्सिया के अनुसार, सर्दियों में लोग बाहर कम जाते हैं, और नए लोगों से मिलने के अवसर भी घट जाते हैं, जिससे डेटिंग ऐप्स पर एक्टिविटी बढ़ जाती है।
क्या मौसम इंसान के रिश्तों को प्रभावित करता है?
हालांकि जानवरों में मौसमी प्रजनन चक्र होता है, जैसे गाय और पक्षी, लेकिन इंसानों में ऐसा नहीं है। इंडियाना यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सू कार्टर के अनुसार, इंसान मौसम के हिसाब से रिश्ते नहीं बनाते। यदि अवसर मिल जाए, तो इंसान किसी भी मौसम में संबंध बना सकता है।







