
सुल्तानपुर। जिले की कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने के नाम पर पिछले 121 दिनों में पुलिस महकमे में 400 से अधिक तबादले, पोस्टिंग और अनुशासनात्मक कार्रवाइयाँ की जा चुकी हैं। पुलिस अधीक्षक चारू निगम ने तबादलों का एक नया रिकॉर्ड तो बना दिया, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि पुलिसिंग अब भी कटघरे में है। हत्या, चोरी और लूट जैसी वारदातों पर अंकुश लगाने में कई थाने लगातार नाकाम साबित हो रहे हैं।
तबादलों की झड़ी, नतीजा सिफर?
महज चार महीने के भीतर 400 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को इधर से उधर करना अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इनमें दरोगा से लेकर सिपाही स्तर तक के जवान शामिल हैं। प्रशासन का तर्क है कि जवाबदेही तय करने और कार्यशैली में सुधार के लिए यह कदम उठाए गए। लेकिन नतीजा यह हुआ कि न तो अपराध पर ब्रेक लगा और न ही थानों की छवि सुधरी। लगातार फेरबदल के चलते पुलिसकर्मी भी अपनी पकड़ जमाने से पहले ही दूसरी जगह भेज दिए जा रहे हैं।
थानों की कार्यशैली पर लगातार उठ रहे सवाल
जिले के कई प्रमुख थाना क्षेत्रों में हत्या और लूट जैसी संगीन वारदातों के खुलासे में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठते रहे हैं। तबादलों की यह रफ्तार या तो विभागीय बेचैनी को दर्शाती है या फिर यह साबित करती है कि समस्या सिर्फ पोस्टिंग की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है। अब देखने वाली बात यह है कि क्या रिकॉर्ड बनाने की यह मुहिम अपराध नियंत्रण में कोई ठोस नतीजा दे पाती है या फिर महज कागज़ी कार्रवाई बनकर रह जाती है।









