
उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) से एक ऐसी मार्मिक और हैरान करने वाली हकीकत सामने आई है, जो बदलते आधुनिक समाज और कमजोर होते पारिवारिक रिश्तों पर गहरा सवाल खड़ा करती है। मोक्ष की नगरी काशी में अब अंतिम संस्कार के लिए ‘चार कंधे’ किराए पर मिलने लगे हैं। यह एक तरह का ऐसा स्टार्टअप या व्यवस्था बनती जा रही है, जो उन लाचार और अकेले लोगों के लिए सहारा बन रही है, जिन्हें अंतिम समय में अपनों का साथ नहीं मिल पाता है।
कहानी की शुरुआत सिन्ना साहब नाम के एक रिटायर्ड अधिकारी से जुड़ी है, जिनकी जीवनसंगिनी का निधन होने के बाद रिश्तेदार दूरी बना लेते हैं। ऊंचे पद पर रहने के कारण कभी अकेलेपन को तरजीह देने वाले सिन्ना साहब को तब अहसास होता है कि जब अपनों ने फोन पर आने से इंकार कर दिया, तो उनकी पत्नी के शव को घाट तक ले जाने के लिए कोई कंधा देने वाला नहीं बचा। ऐसे में कुछ नौजवान आगे आते हैं और पैसे लेकर अंतिम यात्रा को पूरा कराते हैं। ये युवा कोई रिश्तेदार नहीं, बल्कि काशी में उभरती एक नई सामाजिक और व्यावसायिक परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जो अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते हैं और बदले में मेहनताना लेते हैं।
इस सेवा से जुड़े सुभाष सोनी, दीनदयाल गोंड, रमेश और मनीष पाल जैसे लोगों का कहना है कि शुरुआत में उन्होंने इसे सिर्फ पैसे के लिए शुरू किया था, लेकिन अब उन्हें इस काम में एक मानवीय संतोष मिलता है। वे महसूस करते हैं कि आज के दौर में जब लोग मोबाइल और अपनी दुनिया में व्यस्त हैं और किसी के पास दूसरों के लिए वक्त नहीं है, तब ऐसे समय में वे किसी की अंतिम यात्रा को अकेला नहीं छोड़ने का पुण्य और जिम्मेदारी दोनों निभा रहे हैं। यह बाजार की व्यवस्था हो या बदलते समाज की मजबूरी, लेकिन इतना तय है कि काशी में यह नई व्यवस्था इंसानियत और अंतिम यात्रा के धर्म को किसी तरह जीवित रखे हुए है।