
हेल्थ डेस्क : वैज्ञानिकों ने न्यूट्रिशन और मेटाबॉलिज्म के बीच एक नए और पहले से अनजान लिंक की खोज की है, जिसके मुताबिक ज़रूरी अमीनो एसिड ‘ल्यूसीन’ ज़रूरी माइटोकॉन्ड्रियल प्रोटीन को टूटने से बचाकर सेलुलर एनर्जी प्रोडक्शन को बढ़ा सकता है। यह खोज भविष्य में मेटाबॉलिक डिसऑर्डर और कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए नई स्ट्रेटेजी का रास्ता बना सकती है।
माइटोकॉन्ड्रिया को अक्सर सेल का पावरहाउस कहा जाता है क्योंकि वे शरीर को बढ़ने, हिलने-डुलने, टिशू की मरम्मत करने और रोज़ाना के काम करने के लिए ज़रूरी ज़्यादातर एनर्जी बनाते हैं। कोलोन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. थॉर्स्टन हॉप के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने ल्यूसीन से जुड़े एक नए मैकेनिज्म की पहचान की है। ‘नेचर सेल बायोलॉजी’ में छपी इस स्टडी से पता चलता है कि ल्यूसीन माइटोकॉन्ड्रिया में ज़रूरी प्रोटीन को स्टेबल करने में मदद करता है, जिससे ऑर्गेनेल ज़्यादा अच्छे से एनर्जी बना पाते हैं।
ल्यूसीन एक ज़रूरी अमीनो एसिड है, जिसे शरीर खुद पर्याप्त मात्रा में नहीं बना सकता और इसे खाने (जैसे डेयरी प्रोडक्ट, मीट, बीन्स और दाल) के ज़रिए लेना पड़ता है। रिसर्चर्स ने पाया कि ल्यूसीन माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी सतह पर मौजूद प्रोटीन को टूटने से रोकता है। ये प्रोटीन मेटाबॉलिज्म में अहम भूमिका निभाते हैं और दूसरे मॉलिक्यूल को माइटोकॉन्ड्रिया तक पहुँचाने में मदद करते हैं। टीम ने इस असर का पता ‘SEL1L’ नाम के एक प्रोटीन से लगाया, जो सेलुलर क्वालिटी कंट्रोल में शामिल है। ल्यूसीन ‘SEL1L’ की एक्टिविटी को कम करता है, जिससे कम माइटोकॉन्ड्रियल प्रोटीन टूटते हैं।
हालांकि, वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि एनर्जी प्रोडक्शन बढ़ाना हर स्थिति में अपने आप फायदेमंद नहीं होता, क्योंकि प्रोटीन क्वालिटी कंट्रोल का यह बैलेंस बिगाड़ने के अनचाहे नतीजे भी हो सकते हैं। कीड़ों और मानव फेफड़ों के कैंसर सेल्स पर किए गए अध्ययन से यह भी पता चला है कि ल्यूसीन मेटाबॉलिज्म से जुड़े रास्ते कैंसर सेल्स को ज़िंदा रहने में मदद कर सकते हैं, जो भविष्य की रिसर्च के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।









