
नई दिल्ली: मंदिरों में पूजा-पाठ के दौरान बजने वाला शंख केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि इसके बनने और तैयार होने की प्रक्रिया भी बेहद रोचक है। आमतौर पर लोगों को लगता है कि शंख किसी फैक्ट्री में बनाया जाता है, लेकिन असल में यह समुद्र में रहने वाले एक जीव का प्राकृतिक कवच होता है। समुद्री घोंघे यानी मोलस्क अपने शरीर के चारों ओर कैल्शियम कार्बोनेट से कठोर खोल बनाते हैं। यही खोल आगे चलकर शंख के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
समुद्र के अंदर कैसे बनता है शंख?
शंख का निर्माण प्राकृतिक रूप से समुद्र के अंदर होता है। समुद्री घोंघा अपने शरीर से कैल्शियम कार्बोनेट का स्राव करता है, जिससे उसके चारों ओर कठोर खोल तैयार होता है। जैसे-जैसे जीव का आकार बढ़ता है, उसका खोल भी बड़ा और मजबूत होता जाता है।
जब जीव मर जाता है या अपना खोल छोड़ देता है, तो यह समुद्र में रह जाता है। गोताखोर और मछुआरे ऐसे खाली खोल इकट्ठा करते हैं। भारत में तमिलनाडु, केरल और मन्नार की खाड़ी के आसपास के क्षेत्रों में शंख मिलने की जानकारी दी जाती है।
कच्चे शंख को कैसे किया जाता है तैयार?
समुद्र से मिलने वाले कच्चे शंख पर भूरे रंग की बाहरी परत और अंदर गंदगी हो सकती है। इसे इस्तेमाल करने लायक बनाने के लिए सबसे पहले अच्छी तरह साफ किया जाता है।
इसके बाद शंख के नुकीले सिरे को काटकर उसमें छेद बनाया जाता है, ताकि उसे फूंककर बजाया जा सके। बाहरी सतह को ग्राइंडिंग और पॉलिशिंग के जरिए साफ किया जाता है। इससे शंख की सतह चमकदार और सफेद दिखाई देने लगती है।
कुछ कारीगर शंख की सफाई के लिए उबालने या अन्य रासायनिक प्रक्रियाओं का भी इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद इसे सुखाकर आगे की कारीगरी के लिए तैयार किया जाता है।
शंख से बनाए जाते हैं कंगन और खूबसूरत कलाकृतियां
शंख का इस्तेमाल केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल के शंखकार कारीगर इससे सुंदर कंगन, मूर्तियां और कई तरह की सजावटी वस्तुएं बनाते हैं।
कारीगर शंख को काटकर, तराशकर और पॉलिश करके अलग-अलग डिजाइन तैयार करते हैं। इस काम में बारीक कारीगरी और विशेष कौशल की जरूरत होती है। शंख से बने आभूषण और कलाकृतियां अपनी पारंपरिक बनावट के लिए भी पहचानी जाती हैं।
धार्मिक मान्यताओं में भी है शंख का विशेष महत्व
हिंदू धर्म में शंख को पवित्र माना जाता है। इसे भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है और इसका संबंध समुद्र मंथन की कथा से भी जोड़ा जाता है। पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों में शंख बजाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, शंख की ध्वनि को शुभ और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि मंदिरों और घरों में पूजा के दौरान शंख बजाया जाता है।
समुद्र से पूजा की थाली तक पहुंचने का अनोखा सफर
शंख का सफर समुद्र में रहने वाले एक जीव के प्राकृतिक कवच से शुरू होता है। समुद्र से मिलने के बाद इसकी सफाई, कटाई और पॉलिशिंग की जाती है। फिर कारीगर इसे पूजा में इस्तेमाल होने वाले शंख या खूबसूरत कलाकृतियों का रूप देते हैं।
इस तरह प्रकृति की एक अनोखी रचना हमारी पूजा की थाली तक पहुंचती है। अगली बार जब मंदिर में शंख की आवाज सुनाई दे, तो उसके पीछे छिपी इस प्राकृतिक और पारंपरिक प्रक्रिया को भी याद रखिएगा।









