धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर अखिलेश यादव का नया हमला, यूपी की सीमाओं पर बोर्ड लगाने की कही बात

उत्तर प्रदेश में कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक बयानबाजी तक पहुंच गया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले में एक बार फिर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने उत्तर प्रदेश की सीमाओं पर ऐसे बोर्ड लगाए जाने की बात कही है, जिनमें धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले लोगों के प्रवेश पर रोक का संदेश हो। अखिलेश की इस टिप्पणी के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

क्या है पूरा मामला ?

विवाद की शुरुआत मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करेरा में आयोजित रामकथा के दौरान हुई थी। यहां धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप को लेकर टिप्पणी की थी। उनके बयान पर मथुरा-वृंदावन के संतों और कृष्ण भक्तों ने आपत्ति जताई। विरोध करने वालों का कहना था कि दोनों आराध्य देवताओं के स्वरूप को लेकर इस तरह की टिप्पणी उचित नहीं है।

माफी के बाद भी जारी है राजनीतिक प्रतिक्रिया

विवाद बढ़ने पर धीरेंद्र शास्त्री ने वीडियो संदेश जारी कर अपनी बात स्पष्ट की थी। उन्होंने कहा था कि उनका उद्देश्य किसी भगवान का अपमान करना नहीं था। यदि उनकी बात से किसी की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं तो वह क्षमा मांगते हैं। इसके बावजूद इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

अखिलेश यादव ने उठाया सीमाओं का मुद्दा

अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में ब्रज और अवध का जिक्र करते हुए कहा कि संबंधित व्यक्ति का इन क्षेत्रों में स्वागत नहीं होगा। उन्होंने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बोर्ड लगाने का सुझाव भी दिया। इसके जरिए उन्होंने धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले लोगों के प्रदेश में प्रवेश पर सवाल उठाया।

सपा अध्यक्ष ने अपने बयान में नेपाल सीमा का भी उल्लेख किया और तंज कसते हुए कहा कि जरूरत पड़ने पर वहां भी सीमा बंद करने की बात कही जा सकती है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि राजनीतिक विवादों में भगवान को क्यों शामिल किया जा रहा है।

प्रतापगढ़ के कार्यक्रम पर भी नजर

इस पूरे घटनाक्रम के बीच धीरेंद्र शास्त्री का 17 नवंबर से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में धार्मिक कार्यक्रम प्रस्तावित है। ऐसे में उनके कार्यक्रम को लेकर भी लोगों की नजर बनी हुई है। फिलहाल इस विवाद ने धार्मिक टिप्पणियों, संत समाज की आपत्तियों और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं को एक साथ चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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