
एनआरआई और भारतीय मूल के लोग, जो पश्चिमी देशों में अपनी उल्लेखनीय सफलता के लिए जाने जाते हैं, अब भारत के सशक्तिकरण में आर्थिक रूप से भी योगदान दे रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा विश्लेषण के अनुसार, 2023-24 में उन्नत अर्थव्यवस्थाओं से भेजे गए रेमिटेंस की हिस्सेदारी बढ़ी है, और यह खाड़ी देशों से भेजे गए रेमिटेंस को पार कर गया है। भारत के रेमिटेंस 2010-11 में $55.6 बिलियन से बढ़कर 2023-24 में $118.7 बिलियन हो गए हैं, जो देश के लिए आर्थिक शक्ति का स्रोत बने हैं।
श्वेत-कॉलर एनआरआई का उदय
खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासियों का बड़ा हिस्सा मजदूरी वाले कामों में लगा है, जबकि अमेरिका में भारतीय मुख्य रूप से श्वेत-कॉलर नौकरियों में कार्यरत हैं। अमेरिका से भारत को रेमिटेंस की उच्चता का कारण वही है, जबकि प्रवासियों की संख्या संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से कम है। भारतीय प्रवासियों का प्रभाव अब तकनीकी क्षेत्रों के साथ-साथ अन्य उद्योगों में भी नजर आ रहा है, जैसे चिकित्सा, होटल व्यवसाय और खुदरा व्यापार।
अमेरिका में भारतीय-अमेरिकियों की सफलता की कहानी
बीसीजी और इंडियास्पोरा की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में 51 लाख भारतीय प्रवासियों की औसत आय $136,000 है, जो अमेरिकी औसत से लगभग दोगुनी है। ये लोग अमेरिका की कुल जनसंख्या का सिर्फ 1.5% होते हुए भी अमेरिकी करों में 5-6% योगदान देते हैं। भारतीय अमेरिकी अब अमेरिका के प्रमुख उद्योगों में सफलता प्राप्त कर रहे हैं, और सिलिकॉन वैली में उनका योगदान अत्यधिक है।
एनआरआई निवेशकों का भारत में बढ़ता रुझान
अब एनआरआई भारत में विभिन्न क्षेत्रों में निवेश कर रहे हैं, खासकर स्टॉक मार्केट, रियल एस्टेट और अन्य संपत्ति वर्गों में। भारतीय अर्थव्यवस्था की तेजी से वृद्धि, मजबूत स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र, और भारतीय रुपए में गिरावट के कारण भारत एनआरआई निवेशकों के लिए एक आकर्षक गंतव्य बन गया है। इसके साथ-साथ भारत में जीवन स्तर में सुधार और इन्फ्रास्ट्रक्चर में वृद्धि भी एनआरआई निवेशकों को आकर्षित कर रही है।









