किसान आंदोलन : दिल्ली-हरियाणा के कुंडली बॉर्डर पर होगी किसानों की बैठक, बड़ा फैसला संभावित

तथाकथित तीन काले कृषि कानूनों के विरोध में तथाकथित किसान पिछले 1 साल से खेती-गृहस्थी के सभी काम-धंधे छोड़कर धरने पर बैठे हुए हैं और सरकार से तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा बुलाई गयी इस बैठक को लेकर यह माना जा रहा है कि इसमें कई अहम फैसले लिए जा सकते हैं।

किसान आंदोलन के एक साल पूरे हो चुके हैं। इस अवसर पर किसान संगठन संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने दिल्ली-हरियाणा के कुंडली बॉर्डर पर किसानों की एक अहम बैठक बुलाई है। ऐसा माना जा रहा है कि इस बैठक में आंदोलन को लेकर कई अहम फैसले लिए जा सकते हैं। यह बैठक मंगलवार को दोपहर 3 बजे शुरू होगी।

संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य मंजीत राय ने यह जानकारी दी है कि दिल्ली-हरियाणा के कुंडली बॉर्डर पर बुलाई गयी किसानों की इस बैठक को सरकार के रवैये को लेकर और आंदोलन के आगे के स्वरुप को तय करने के लिए बेहद अहम है। उन्होंने कहा कि सरकार को झुकाने के लिए किसान आंदोलन को अब तेज करने की जरुरत है। उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के प्रदेश अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने मोर्चे के किसानों को बरगलाते हुए कहा कि अब उन्हें दिल्ली के बॉर्डरों पर धरना देने से काम नहीं चलने वाला है। अब किसानों को चाहिए कि वे दिल्ली के भीतर घुसकर प्रधानमंत्री के आवास के बाहर धरना दें। उन्होंने आगे कहा कि सरकार बॉर्डरों को खोल रही है, किसानों के पास यह बेहतर मौका है कि वे दिल्ली में प्रस्थान करें और अपने आंदोलन से जरिये प्रधानमंत्री आवास और संसद का घेराव करें।

दरअसल, तथाकथित तीन काले कृषि कानूनों के विरोध में तथाकथित किसान पिछले 1 साल से खेती-गृहस्थी के सभी काम-धंधे छोड़कर धरने पर बैठे हुए हैं और सरकार से तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा किसानों की यह मांग है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की लिखकर गारंटी दे जबकि संवैधान में एमएसपी का कोई जिक्र ही नहीं है।

किसान आंदोलन की अवधि जैसे-जैसे बढ़ रही थी, इसके कई स्वरूप देखने को मिले थे। इन तथाकथित किसानों ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर जो उत्पात लाल-किले पर मचाया था वह किसी से छिपा नहीं है। किसानों के इस दुस्साहस के बाद सरकार और उनके बीच गतिरोध और बढ़ता गया। इससे पहले 22 जनवरी तक भारत सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी थी लेकिन इससे कोई नतीजा नहीं निकल सका था हालांकि इस पुरे मुद्दे पर प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि वो किसानों से मात्र एक फोन कॉल की दुरी पर हैं लेकिन किसान संगठनों ने यही जिद्द ठान रखी है कि वे कृषि कानून को रद्द करने के अलावा किसी शर्त पर नहीं मानेंगे।

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