
नई दिल्ली। करोड़ों साल पहले समुद्र में रहने वाला एक छोटा सा कीड़े जैसा जीव, जिसके सिर पर सिर्फ एक आंख थी—यही आज के इंसानों और हर रीढ़ वाले जानवर का पूर्वज हो सकता है। लुंड यूनिवर्सिटी (स्वीडन) और यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स (ब्रिटेन) की एक नई रिसर्च ने आंखों के विकास को लेकर अब तक की हमारी समझ को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्राचीन एक-आंख वाला जीव ही हमारी जोड़ीदार आंखों की असली वजह है और इसकी निशानी आज भी हमारे दिमाग में पीनियल ग्लैंड के रूप में मौजूद है।
कैसा था यह साइक्लोप्स जैसा पूर्वज?
रिसर्च के मुताबिक, करीब 600 मिलियन साल पहले यह जीव समुद्र में एक ही जगह पड़ा रहता था और आसपास के पानी से प्लैंकटन छानकर अपना पेट भरता था। इससे पहले इसके विकास के दौरान इसके पास रोशनी पहचानने वाली दो आंखें या कोशिकाओं के समूह थे, लेकिन एक जगह स्थिर रहने वाली जिंदगी में इन जोड़ीदार आंखों का कोई खास फायदा नहीं था। नतीजा यह हुआ कि कई पीढ़ियों के दौरान ये आंखें धीरे-धीरे खत्म हो गईं। हालांकि, सिर के बीचों-बीच रोशनी पहचानने वाली कोशिकाओं का एक झुंड बचा रहा, जो बाद में एक ‘मीडियन आई’ यानी बीच वाली आंख में तब्दील हो गया।
इस एक आंख का क्या काम था?
यह बीच वाली आंख कोई साफ तस्वीरें तो नहीं बना पाती थी, लेकिन इसने जीव को दिन और रात का फर्क समझने और यह तय करने में मदद जरूर की कि ऊपर कौन सी दिशा है। समुद्र में जिंदा रहने के लिए ये दोनों चीजें बेहद जरूरी थीं।
फिर कैसे लौटीं जोड़ीदार आंखें?
लाखों सालों बाद जब इस जीव के वंशज फिर से सक्रिय होकर तैरने लगे, तो उन्हें भोजन ढूंढने, शिकारियों से बचने और रास्ता तय करने के लिए दोबारा बेहतर नजर की जरूरत पड़ी। रिसर्चर्स का मानना है कि इवोल्यूशन ने तब उसी पुरानी बीच वाली आंख के कुछ हिस्सों को दोबारा इस्तेमाल किया और धीरे-धीरे इससे आज की तरह इमेज बनाने वाली जोड़ीदार आंखें विकसित हो गईं।
हमारी आंखें कीड़ों से अलग क्यों हैं?
रिसर्च के प्रमुख वैज्ञानिक प्रोफेसर डैन-ई निल्सन कहते हैं, अब हम आखिरकार समझ गए हैं कि रीढ़ वाले जानवरों की आंखें कीड़ों और स्क्विड की आंखों से इतनी अलग क्यों होती हैं। हमारी आंखों की रेटिना दिमाग से बनी है, जबकि कीड़ों और स्क्विड की आंखें सिर की त्वचा से विकसित होती हैं। रेटिना आंख के पिछले हिस्से में ऊतकों की एक पतली परत होती है, जो रोशनी को पहचानकर इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलती है और दिमाग तक भेजती है।
आंखों के विकास का अनोखा सफर
वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष जानवरों के विभिन्न समूहों में रोशनी पहचानने वाली कोशिकाओं की बड़ी तुलना के बाद निकाला है। टीम ने जांच की कि ये कोशिकाएं शरीर में कहां दिखाई देती हैं, कैसे काम करती हैं और दूसरे ऊतकों और नसों से कैसे जुड़ती हैं। पूरे सबूत इसी ओर इशारा करते हैं कि रीढ़ वाले जानवरों की आंखें इसी अनोखे क्रम से बनीं। प्रोफेसर निल्सन कहते हैं, पहली बार, अब हम उन न्यूरल सर्किट की शुरुआत को भी समझते हैं जो हमारे रेटिना में इमेज को एनालाइज करते हैं।









