कानपुर उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला : 24 रुपये की ‘खाली बाम डिब्बी’ पर 5 साल लड़ी कानूनी लड़ाई,अब कंपनी देगी 40 हजार का हर्जाना

कानपुर : “जागो ग्राहक जागो” के नारे को चरितार्थ करता हुआ एक बेहद अनोखा और मिसाल पेश करने वाला मामला कानपुर के उपभोक्ता फोरम (Consumer Court) से सामने आया है। यहाँ एक उपभोक्ता ने महज 24 रुपये के हक के लिए पूरे 5 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। उपभोक्ता आयोग ने पीड़ित ग्राहक के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विपक्षियों पर तगड़ा जुर्माना ठोका है।

आयोग ने न सिर्फ बाम के 24 रुपये वापस करने को कहा है, बल्कि मानसिक प्रताड़ना और अदालती खर्च के एवज में 40,000 रुपये का भारी-भरकम हर्जाना देने का भी निर्देश दिया है।

क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला कानपुर के राजीव पुरम के रहने वाले सुधीन्द्र कुमार से जुड़ा हुआ है। सुधीन्द्र ने 5 साल पहले एक लोकल मेडिकल स्टोर से सिरदर्द से राहत पाने के लिए 24 रुपये में एक नामी ब्रांड (झंडू बाम) की डिब्बी खरीदी थी। लेकिन जब उन्होंने घर जाकर डिब्बी को खोला, तो वह पूरी तरह से खाली निकली।

महज 24 रुपये का मामला समझकर बैठने के बजाय सुधीन्द्र ने उपभोक्ता अधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया। उन्होंने इसके खिलाफ कानपुर उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

मेडिकल स्टोर और नामी कंपनी ‘इमामी लिमिटेड’ पर गिरी गाज
सुधीन्द्र की शिकायत पर लंबी सुनवाई और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद उपभोक्ता आयोग ने इसे सेवा में बड़ी लापरवाही और ‘अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस’ माना। आयोग ने इस मामले में आदर्श मेडिकल स्टोर और बाम बनाने वाली मशहूर कंपनी इमामी लिमिटेड (Emami Limited) को संयुक्त रूप से दोषी पाया।

कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
उपभोक्ता आयोग ने अपने कड़े फैसले में साफ किया कि ग्राहकों के भरोसे के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आयोग ने निर्देश दिए:

मूल रकम की वापसी: शिकायतकर्ता को बाम की कीमत के रूप में 24 रुपये तुरंत लौटाए जाएं।

40 हजार का हर्जाना: उपभोक्ता को हुई मानसिक परेशानी, समय की बर्बादी और मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में दोनों विपक्षी मिलकर 40,000 रुपये का हर्जाना देंगे।

यह फैसला उन सभी कंपनियों और दुकानदारों के लिए एक कड़ा संदेश है जो पैकेजिंग या डिफेक्टिव प्रोडक्ट के मामलों को हल्के में लेते हैं। साथ ही यह आम जनता को भी प्रेरित करता है कि हक की लड़ाई में रकम छोटी या बड़ी नहीं होती, न्याय की प्रक्रिया सबसे ऊपर है।

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