राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का 68वां जन्मदिन आज, संघर्ष से शिखर तक की प्रेरक कहानी, जानिए उनके जीवन से जुड़ी खास बातें

नई दिल्ली। भारत की 15वीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज अपना 68वां जन्मदिन मना रही हैं। ओडिशा के सुदूर गांव उपरबेड़ा में एक गरीब संताली परिवार में जन्मीं द्रौपदी मुर्मू का जीवन किसी प्रेरणादायक गाथा से कम नहीं है। स्कूल शिक्षक से लेकर राष्ट्रपति भवन तक का उनका सफर अदम्य साहस और जुझारू व्यक्तित्व की मिसाल है। वह किसी आदिवासी समुदाय से राष्ट्रपति बनने वाली पहली और प्रतिभा पाटिल के बाद देश के इस सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाली दूसरी महिला हैं। इतना ही नहीं, स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाली और महज 64 वर्ष की आयु में यह जिम्मेदारी संभालने वाली भी वह पहली राष्ट्रपति हैं।

द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून 1958 को रायरांगपुर जिले के बैदापोसी इलाके में पिता बिरंची नारायण टुडू के घर हुआ था। उनके पिता और दादा दोनों ही अपने गांव की पारंपरिक ग्राम पंचायत के मुखिया रहे थे। बचपन में परिवार ने उनका नाम दादी के नाम पर दुर्गी टुडू रखा था और प्यार से उन्हें पुती बुलाया जाता था। बाद में स्कूल के एक शिक्षक ने उनका नाम बदलकर द्रौपदी रख दिया। शुरुआती पढ़ाई गांव के स्थानीय स्कूल से करने के बाद वह आगे की शिक्षा के लिए भुवनेश्वर चली गईं, जहां से उन्होंने रमा देवी महिला विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की।

1980 में श्याम चरण मुर्मू से शादी के बाद उनका पारिवारिक जीवन शुरू हुआ और वह तीन बच्चों की मां बनीं, लेकिन किस्मत को यह मंजूर नहीं था। महज सात साल के भीतर, 2009 से 2015 के बीच, उन्होंने अपने पति, दोनों बेटों, मां और भाई को खो दिया। एक बेटे की सड़क दुर्घटना में मौत हुई तो दूसरे की रहस्यमय परिस्थितियों में। इतने बड़े निजी दुखों को झेलने के बाद भी उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया और आध्यात्म की ओर रुख किया। वह ब्रह्माकुमारीज आंदोलन से जुड़ीं और खुद को पूरी तरह समाज सेवा में समर्पित कर दिया।

राजनीति में कदम रखने से पहले द्रौपदी मुर्मू ने ओडिशा सरकार के सिंचाई विभाग में क्लर्क और बाद में रायरांगपुर के श्री अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर में शिक्षिका के तौर पर काम किया। 1997 में वह पहली बार रायरांगपुर नगर पंचायत की पार्षद चुनी गईं और फिर भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गईं। साल 2000 में वह रायरांगपुर सीट से ओडिशा विधानसभा पहुंचीं और लगातार दो कार्यकाल तक विधायक रहीं। इस दौरान उन्होंने बीजद-भाजपा गठबंधन सरकार में वाणिज्य, परिवहन, मत्स्य पालन और पशु संसाधन विकास जैसे विभागों में स्वतंत्र प्रभार से लेकर मंत्री पद तक की जिम्मेदारी संभाली। 2007 में उन्हें ओडिशा विधानस्या का सर्वश्रेष्ठ विधायक चुना गया।

2015 में इतिहास रचते हुए वह झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनीं और इस पद पर पूरे छह साल तक रहीं, जो राज्य में अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल है। राज्यपाल रहने के दौरान उन्होंने आदिवासी भूमि अधिकारों से जुड़े संवेदनशील पथलगड़ी आंदोलन के दौरान विवादित विधेयकों को लौटाकर अपनी स्पष्ट सोच का परिचय दिया। जून 2022 में भाजपा ने उन्हें एनडीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित किया और जुलाई में उन्होंने विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को भारी अंतर से हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

राष्ट्रपति के तौर पर अपने कार्यकाल में द्रौपदी मुर्मू ने कई यादगार पहल की हैं। सितंबर 2022 में वह मैसूर दशहरा उत्सव का उद्घाटन करने वाली पहली राष्ट्रपति बनीं तो अप्रैल 2023 में असम के तेजपुर एयरबेस पर सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान में उड़ान भरकर साहस की नई मिसाल कायम की। 22 जनवरी 2024 को वह अयोध्या में राम मंदिर के ऐतिहासिक प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुईं। उनके नाम एक और उपलब्धि तब जुड़ी जब सी.पी. राधाकृष्णन के उपराष्ट्रपति बनने के बाद वह तीन उपराष्ट्रपतियों के साथ काम करने वाली पहली राष्ट्रपति बनीं। कोलकाता की दर्दनाक बलात्कार-हत्या कांड पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा था- “बहुत हो गया,” जो देश की बेटियों की सुरक्षा को लेकर उनके दर्द और संकल्प को बखूबी दर्शाता है।

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