
नई दिल्ली। नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर 20 दिनों से भूख हड़ताल कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को शुक्रवार सुबह हाई कोर्ट के आदेश पर बिगड़ती सेहत के चलते सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा लिया गया। वांगचुक का यह पहला अनशन नहीं था, इससे पहले भी वे कई बार सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर चुके हैं। भारत में भूख हड़ताल का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है, जिसने देश की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई है। आइए नजर डालते हैं इस ऐतिहासिक सफर पर।
महात्मा गांधी का सत्याग्रह

भारत की आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने कई बार भूख हड़ताल को अपना हथियार बनाया। 1924 में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम दंगों को रोकने और सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने के लिए 21 दिनों का उपवास रखा। वहीं, 1933 में 8 मई से 29 मई तक 21 दिनों का एक और अनशन किया, जो अंग्रेजों के खिलाफ नहीं बल्कि भारतीय समाज में फैली छुआछूत को मिटाने और हरिजनों के उत्थान के लिए आत्म-शुद्धि का प्रयास था।
जतिन दास का 63 दिन का उपवास

स्वतंत्रता सेनानी जतींद्र नाथ दास ने भारतीय राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए लाहौर की बोर्स्टल जेल में 13 जुलाई 1929 को भूख हड़ताल शुरू की थी। 63 दिनों की इस लंबी और पीड़ादायक हड़ताल के बाद मात्र 24 वर्ष की आयु में 13 सितंबर 1929 को उनका निधन हो गया।
पोट्टी श्रीरामुलु का बलिदान और आंध्र प्रदेश का निर्माण

पोट्टी श्रीरामुलु ने 19 अक्टूबर 1952 को आंध्र प्रदेश के गठन की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया। 56 दिनों तक चले इस अनशन के बाद 15 दिसंबर 1952 को उनकी मौत हो गई, जिसके बाद देश भर में आक्रोश फूट पड़ा और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को आंध्र प्रदेश राज्य के गठन की घोषणा करनी पड़ी।
अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन

समाजसेवी अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल 2011 को जंतर-मंतर पर लोकपाल बिल की मांग को लेकर अनशन शुरू किया, जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की चिंगारी भड़का दी। अगस्त 2011 में दूसरे अनिश्चितकालीन अनशन के दौरान गिरफ्तारी के बाद यह आंदोलन रामलीला मैदान पहुंचा, जहां रोज हजारों समर्थक जुटते थे। इसी ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन से लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट 2013 पास हुआ और बाद में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी का गठन हुआ।
प्रो. जीडी अग्रवाल का 111 दिन का बलिदान

गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखने की मांग को लेकर संन्यासी स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (प्रो. जीडी अग्रवाल) ने कई बार अनशन किया और आखिरकार 2018 में 111 दिनों के आमरण अनशन के दौरान उनका निधन हो गया।
इरोम शर्मिला का 16 साल का संघर्ष

मणिपुर की ‘आयरन लेडी’ इरोम चानू शर्मिला ने राज्य से अफस्पा हटाने की मांग को लेकर 2000 में अनशन शुरू किया। असम राइफल्स द्वारा 10 नागरिकों की हत्या के विरोध में शुरू हुआ यह अनशन लगातार 16 साल तक चला, जिसके दौरान सरकार ने जबरदस्ती नाक से पोषण देकर उन्हें जिंदा रखा। 9 अगस्त 2016 को उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया।









