
हाल ही में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट का अमेरिका द्वारा स्वागत किए जाने पर राजनीतिक और कूटनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस बीच, पूर्व सीनियर डिप्लोमैट विद्या भूषण सोनी ने इस पूरे घटनाक्रम पर एक महत्वपूर्ण विश्लेषण पेश किया है। उनका कहना है कि वॉशिंगटन का इस समझौते को स्वीकार करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका का क्षेत्रीय प्रभाव अब धीरे-धीरे कम हो रहा है, और इस स्थिति का फायदा उठाकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपना पूरा ध्यान ईरान पर केंद्रित कर सकते हैं।
सोमवार को मीडिया से चर्चा करते हुए पूर्व राजदूत सोनी ने बताया कि यह समझौता इस बात का पुख्ता सबूत है कि अमेरिका अब दुनिया के उन संवेदनशील क्षेत्रों को अकेले अपने दम पर स्थिर करने की स्थिति में नहीं है, जहां कभी उसकी प्रमुख भूमिका हुआ करती थी। उन्होंने सऊदी अरब के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौती यानी ‘हूथी फैक्टर’ का विशेष रूप से जिक्र किया। उनके अनुसार, रियाद के लिए हूती विद्रोही सबसे बड़ी सिरदर्दी बने हुए हैं, जो लगातार समुद्री व्यापार, विशेषकर बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य के आसपास कार्गो मूवमेंट को बाधित कर रहे हैं और क्षेत्र को अस्थिर कर रहे हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान ज्यादातर इजराइल-फिलीस्तीन संघर्ष और ईरान पर रहता है, लेकिन सऊदी अरब के लिए हूतियों की गतिविधियां सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हैं।
सोनी ने यह भी याद दिलाया कि पिछले साल भी सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच इसी तरह का एक समझौता हुआ था, लेकिन उसका हूतियों की गतिविधियों पर कोई खास असर नहीं दिखा क्योंकि पाकिस्तान उसमें प्रभावी रूप से शामिल नहीं हो पाया। नए डिफेंस पैक्ट पर ट्रंप के रुख के बारे में उन्होंने कहा कि इसे ईरान के खिलाफ वाशिंगटन की प्राथमिकताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यदि कोई अन्य क्षेत्रीय स्रोत हूतियों की चुनौती से निपटने में सक्षम होता है, तो इससे अमेरिका पर पड़ने वाला दबाव काफी हद तक कम हो जाएगा।
इसके अलावा, उन्होंने इस घटनाक्रम को ट्रंप की उस पुरानी रणनीति से भी जोड़ा जिसके तहत वे अधिक से अधिक देशों को अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल करना चाहते हैं। हालांकि पाकिस्तान घरेलू और राजनीतिक कारणों से फिलीस्तीन के मुद्दे को छोड़े बिना खुलकर इसका समर्थन नहीं कर सकता, फिर भी इस तरह के क्षेत्रीय रक्षा प्रबंधों से अंततः इजराइल की सुरक्षा मजबूत होती है। इस नए समझौते में अमेरिका का कोई सीधा वित्तीय या सैन्य खर्च शामिल नहीं है; बल्कि इसमें सऊदी अरब का पैसा, तुर्की की आधुनिक तकनीक और पाकिस्तान की जमीनी सेना का संयोजन देखने को मिलेगा। कुल मिलाकर, इस समझौते से अमेरिका अपनी क्षेत्रीय जिम्मेदारियों के बोझ को हल्का कर अपने मुख्य रणनीतिक लक्ष्य यानी ईरान को रोकने की दिशा में अधिक मजबूती से ध्यान केंद्रित कर सकेगा।









