
चंबल की धरती को लंबे समय तक बंदूकों और बागियों की कहानियों के लिए जाना जाता रहा है। इसी चंबल से निकले देव प्रभाकर सिंह तोमर की कहानी संघर्ष, असफलता और सफलता की ऐसी मिसाल है, जो बताती है कि मुश्किल हालात इंसान के रास्ते को रोक नहीं सकते। परिवार की पिछली पीढ़ी जहां परिस्थितियों के चलते बागी बनने को मजबूर हुई, वहीं देव ने शिक्षा को अपना हथियार बनाया। उन्होंने पहले IIT में जगह बनाई और इसके बाद UPSC परीक्षा पास कर अफसर बनने का सपना पूरा किया।

चंबल से शुरू हुई देव प्रभाकर तोमर की कहानी
देव प्रभाकर सिंह तोमर की कहानी मध्य प्रदेश के मुरैना जिले से शुरू होती है। जोशटॉक के वीडियो प्लेटफॉर्म पर अपनी जर्नी साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उनके दादाजी को विषम पारिवारिक और सरकारी परिस्थितियों के कारण बागी बनना पड़ा था। पुलिस की भाषा में उन्हें डकैत कहा गया।
दादा के बागी बनने के बाद परिवार को आर्थिक संकट समेत कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। देव के पिता ने इस स्थिति को बदलने का संकल्प लिया और शिक्षा को परिवार की अगली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित करने का माध्यम बनाया।
भाषा और संसाधनों की चुनौती के बीच IIT तक पहुंचे
शुरुआती शिक्षा के बाद देव ने CBSE बोर्ड में प्रवेश लिया। यहां उन्हें भाषा और सांस्कृतिक कारणों से कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और 11वीं कक्षा से IIT की तैयारी की।
संसाधनों की कमी के बावजूद देव ने घर पर रहकर पढ़ाई की और अपने पहले ही प्रयास में IIT रोपड़ में प्रवेश हासिल कर लिया। IIT की पढ़ाई के बाद उन्हें विदेश में नौकरी करने का अवसर मिला।
विदेश की नौकरी छोड़ी, UPSC को बनाया लक्ष्य
विदेश में अच्छे पद पर काम करने के बावजूद देव को वह संतुष्टि नहीं मिली जिसकी उन्हें तलाश थी। उनका मन समाज के ग्रास-रूट स्तर पर काम करने की ओर बढ़ा और उन्होंने UPSC की तैयारी करने का फैसला किया।
इसके लिए उन्होंने नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया। परिवार इस फैसले से सहमत नहीं था। इसके बाद UPSC की तैयारी का दौर शुरू हुआ, लेकिन शुरुआती प्रयासों में उन्हें लगातार प्रीलिम्स में असफलता मिली।
कई बार ऐसी स्थिति आई जब उन्होंने हार मानने और अपने नोट्स तक बेच देने का विचार किया। लेकिन उन्होंने अपनी रणनीति बदलने का फैसला किया।
असफलताओं से सीखा, ‘स्मार्ट वर्क’ पर दिया जोर
देव ने अपनी गलतियों को पहचानकर तैयारी का तरीका बदला। उन्होंने ‘स्मार्ट वर्क’ पर ध्यान केंद्रित किया और प्रीलिम्स से लेकर इंटरव्यू तक के लिए अनुशासित रणनीति तैयार की।
इस संघर्ष के दौरान उन्हें व्यक्तिगत जीवन में भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। रिश्तों के टूटने और समाज के तानों के बीच भी उन्होंने तैयारी जारी रखी। उन्होंने मेंटरशिप के जरिए अपने खर्च निकालते हुए UPSC की तैयारी को आगे बढ़ाया।

आखिरी प्रयास में मिली 629वीं रैंक
देव ने अपने आखिरी प्रयास में नौकरी के साथ UPSC की परीक्षा दी। इस बार उनकी मेहनत सफल हुई और उन्होंने 629वीं रैंक हासिल की। इसके साथ ही उनका चयन IRTS अधिकारी के रूप में हुआ।
देव की कहानी चंबल के उस पारिवारिक अतीत से बिल्कुल अलग रास्ता दिखाती है, जिसमें बंदूक की जगह किताब और संघर्ष के बीच शिक्षा को चुना गया। दादा की ‘बागी’ पहचान के बीच देव ने अपनी मेहनत और शिक्षा के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई और परिवार का नाम रोशन किया।









