
नई दिल्ली: भारत में हवाई सफर करने वाले यात्रियों के लिए त्योहारों और छुट्टियों के दौरान फ्लाइट टिकटों की बढ़ती कीमतें अक्सर परेशानी का कारण बनती हैं। कई बार सामान्य दिनों की तुलना में टिकटों के दाम काफी ज्यादा हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हवाई किराया कौन तय करता है और क्या सरकार इस पर नियंत्रण रखती है? केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि सामान्य परिस्थितियों में हवाई किराया सीधे तौर पर सरकार तय नहीं करती। देश में विमानन कंपनियां मांग और आपूर्ति के आधार पर टिकटों की कीमत निर्धारित करती हैं। हालांकि, आपातकालीन परिस्थितियों में सरकार के पास हस्तक्षेप करने के अधिकार मौजूद हैं।
कौन तय करता है फ्लाइट टिकटों के दाम?
भारत में हवाई टिकटों की कीमत तय करने का अधिकार मुख्य रूप से विमानन कंपनियों के पास है। एयरलाइंस डायनामिक प्राइसिंग मॉडल के तहत किराया निर्धारित करती हैं। इसका मतलब है कि किसी उड़ान में सीटों की मांग बढ़ने और उपलब्ध सीटों की संख्या घटने पर टिकट महंगे हो सकते हैं।
त्योहारों, गर्मियों की छुट्टियों और अन्य व्यस्त सीजन में यात्रियों की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे समय में सीमित सीटों की मांग अधिक होने के कारण किराए में बढ़ोतरी देखने को मिलती है। वहीं, कम मांग वाले समय में एयरलाइंस यात्रियों को आकर्षित करने के लिए कम कीमत पर टिकट भी उपलब्ध करा सकती हैं।
कैसे तय होती है हवाई टिकट की अंतिम कीमत?
फ्लाइट टिकट की कुल कीमत में कई तरह के शुल्क शामिल होते हैं। इनमें प्रमुख रूप से ये घटक होते हैं:
- बेस फेयर: यह विमानन कंपनी द्वारा हवाई यात्रा के लिए निर्धारित मूल किराया होता है।
- फ्यूल सरचार्ज: एयरलाइन की शुल्क संरचना के अनुसार ईंधन से संबंधित अतिरिक्त शुल्क लिया जा सकता है।
- एयरपोर्ट शुल्क: हवाई अड्डे की सुविधाओं और सेवाओं से जुड़े लागू शुल्क टिकट की कीमत में शामिल हो सकते हैं।
- यूजर डेवलपमेंट फीस (UDF): संबंधित हवाई अड्डे पर लागू नियमों के अनुसार यात्रियों से यह शुल्क लिया जा सकता है।
इनके अलावा लागू कर और अन्य वैध शुल्क भी टिकट की अंतिम कीमत को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए यात्रियों को टिकट बुक करते समय केवल बेस फेयर के बजाय कुल देय राशि पर ध्यान देना चाहिए।
क्या सरकार हवाई किराए पर लगा सकती है रोक?
सामान्य परिस्थितियों में केंद्र सरकार रोजाना के हवाई किराए तय नहीं करती। हालांकि, विशेष परिस्थितियों में सरकार के पास हस्तक्षेप करने के अधिकार हो सकते हैं। प्राकृतिक आपदा, बड़े संकट या अन्य असाधारण परिस्थितियों में यात्रियों को राहत देने के लिए किराए पर सीमा लगाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
इसका उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों में यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाकर अत्यधिक किराया वसूलने पर रोक लगाना है। हालांकि, ऐसी व्यवस्था लागू होने की स्थिति संबंधित सरकारी आदेश और परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
हवाई किराए को लेकर क्या हैं नियम?
हवाई किराए और विमानन कंपनियों की जवाबदेही से जुड़े नियमों का उद्देश्य टिकटों की कीमतों में पारदर्शिता बनाए रखना है। विमानन कंपनियों को लागू नियमों के अनुसार किराए और शुल्क से संबंधित जानकारी यात्रियों के सामने स्पष्ट करनी होती है।
भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत विमानन क्षेत्र के नियामक ढांचे को कानूनी आधार मिला है। हालांकि, किराए से संबंधित किसी विशेष प्रावधान, उसकी लागू होने की तारीख और अनिवार्यताओं की पुष्टि संबंधित नियमों या आधिकारिक अधिसूचना से की जानी चाहिए।
DGCA की क्या है भूमिका?
नागरिक उड्डयन महानिदेशालय यानी DGCA भारत में विमानन क्षेत्र का प्रमुख नियामक है। यह विमानन सुरक्षा और अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले नियामकीय प्रावधानों के अनुपालन की निगरानी करता है।
DGCA की भूमिका को रोजाना हवाई टिकटों के दाम तय करने वाली संस्था के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किराए से जुड़े नियमों के उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई संबंधित प्रावधानों और सक्षम प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र के अनुसार होती है।
यात्रियों को टिकट बुक करते समय किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
त्योहारों और छुट्टियों के दौरान हवाई सफर की योजना बनाने वाले यात्रियों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- संभव हो तो यात्रा की तारीख पहले से तय करके टिकट बुक करें।
- अलग-अलग एयरलाइंस के कुल किराए और शुल्क की तुलना करें।
- टिकट बुक करने से पहले रिफंड, कैंसिलेशन और बदलाव की शर्तें पढ़ें।
- केवल शुरुआती किराया देखकर फैसला न करें, बल्कि अंतिम भुगतान राशि जांचें।
- यात्रा की तारीखों में बदलाव संभव हो तो वैकल्पिक दिनों के किराए भी देखें।









