
‘जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन’, लोकतंत्र की यह परिभाषा आज दुनिया के ज्यादातर देशों की शासन व्यवस्था का आधार है। आज संसद में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि बैठकर देश और सरकार से जुड़े अहम फैसले लेते हैं, लेकिन इस व्यवस्था तक पहुंचने का इतिहास हजारों साल पुराना है।
राजा-महाराजाओं और निरंकुश शासन के दौर में आम लोगों की आवाज को सत्ता के केंद्र तक पहुंचाना किसी क्रांतिकारी बदलाव से कम नहीं था। प्राचीन यूनान से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक गणराज्यों तक जनता की भागीदारी और संसद के विकास की कहानी बेहद रोचक रही है।
एथेंस में पड़ा लोकतंत्र का पहला बीज
लोकतंत्र की शुरुआती अवधारणा करीब 2500 साल पहले यानी 5वीं सदी ईसा पूर्व में प्राचीन यूनान के एथेंस में विकसित हुई। उस समय दुनिया के बड़े हिस्से में राजशाही और निरंकुश शासन का प्रभाव था। ऐसे दौर में एथेंस के नागरिकों ने शासन में जनता की भागीदारी का विचार सामने रखा।
यहां राज्य से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले किसी एक शासक की इच्छा के बजाय नागरिकों की सहमति से लिए जाने लगे। एथेंस ने यह विचार मजबूत किया कि आम नागरिक भी शासन और राज्य के फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
प्रतिनिधि नहीं, नागरिक खुद लेते थे फैसले
प्राचीन एथेंस का लोकतंत्र आज की व्यवस्था से काफी अलग था। उस समय नागरिक अपने प्रतिनिधियों को चुनकर संसद में नहीं भेजते थे, बल्कि स्वयं सभाओं में शामिल होकर फैसले लेते थे।
कानून बनाने, युद्ध जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय लेने और सार्वजनिक मामलों पर चर्चा के लिए नागरिक एकत्र होते थे और मतदान करते थे। लोकतंत्र की इस व्यवस्था को प्रत्यक्ष लोकतंत्र कहा जाता है।
लेकिन लोकतंत्र सबके लिए नहीं था
एथेंस की लोकतांत्रिक व्यवस्था अपने समय में महत्वपूर्ण बदलाव थी, लेकिन इसमें सभी लोगों को समान राजनीतिक अधिकार हासिल नहीं थे। केवल स्वतंत्र पुरुष नागरिक ही राजनीतिक सभाओं में भाग ले सकते थे।
महिलाओं, गुलामों और बाहर से आकर बसे लोगों को इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया था। यानी लोकतंत्र की शुरुआती व्यवस्था सीमित अधिकारों पर आधारित थी। इसके बावजूद नागरिकों की शासन में भागीदारी का यह प्रयोग आगे विकसित होने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण आधार बना।
आइसलैंड में बनी दुनिया की शुरुआती संसद
जब दुनिया की सबसे पुरानी संसदों की बात होती है, तो आइसलैंड की आलथिंग (Althing) का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वर्ष 930 ईस्वी में आइसलैंड में इस राष्ट्रीय सभा की स्थापना हुई।
उस समय वाइकिंग सरदारों और विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुखों ने मिलकर ऐसी सभा बनाई, जहां सामुदायिक नियमों पर चर्चा हो सके और विवादों का समाधान किया जा सके। इसे दुनिया की सबसे पुरानी संसदीय संस्थाओं में से एक माना जाता है।
खुले मैदान में होती थी संसद की बैठक
आलथिंग की शुरुआती बैठकें किसी भव्य संसद भवन में नहीं, बल्कि थिंगवेलिर (Thingvellir) के खुले क्षेत्र में आयोजित होती थीं। यहां लोग हर साल एकत्र होकर कानून और सामाजिक मामलों पर चर्चा करते थे।
समय के साथ यह संस्था विकसित होती गई और आइसलैंड की राजनीतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रही। आज आलथिंग आइसलैंड की राष्ट्रीय संसद है और इसकी ऐतिहासिक जड़ें थिंगवेलिर की उसी सभा से जुड़ी मानी जाती हैं।
प्रत्यक्ष लोकतंत्र से प्रतिनिधि लोकतंत्र तक
जैसे-जैसे समाज और आबादी का विस्तार हुआ, हर नागरिक का एक जगह इकट्ठा होकर सीधे फैसले लेना व्यावहारिक नहीं रहा। इसके बाद प्रतिनिधि लोकतंत्र का विकास हुआ। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर उन्हें शासन और कानून बनाने की जिम्मेदारी देने लगी।
आधुनिक दौर में संसद इसी प्रतिनिधि व्यवस्था का प्रमुख संस्थागत रूप बन गई। अलग-अलग देशों में लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली ने अपने-अपने ऐतिहासिक और संवैधानिक विकास के अनुसार स्वरूप लिया।
भारत में लोकतांत्रिक गणराज्य की शुरुआत
भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को स्वतंत्रता के बाद संविधान के माध्यम से संस्थागत रूप मिला। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना।
आज भारत में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनाव के जरिए चुनती है और यही प्रतिनिधि संसद तथा विधानसभाओं में कानून और शासन से जुड़े फैसलों में भाग लेते हैं। भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य माना जाता है, जहां वयस्क नागरिकों को मतदान का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
लोकतंत्र का यह सफर बताता है कि जनता की शासन में भागीदारी का विचार एक दिन में नहीं बना, बल्कि हजारों वर्षों में अलग-अलग सभ्यताओं और राजनीतिक व्यवस्थाओं के अनुभवों से विकसित होकर आधुनिक लोकतंत्र तक पहुंचा।









