हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘जज को आपराधिक कानून की बुनियादी समझ नहीं’, पुलिसकर्मियों पर FIR का आदेश रद्द

लखनऊ/प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के एक आदेश को रद्द करते हुए न्यायिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि संबंधित जज के आदेश से आपराधिक कानून और उसकी प्रक्रिया की बुनियादी समझ में कमी दिखाई देती है। साथ ही, हाईकोर्ट ने पूरे उत्तर प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं, ताकि लोक सेवकों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए दिए जाएं।

क्या है पूरा मामला ?

मामला महाराजगंज के विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट) की अदालत से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, 11 अगस्त 2026 को दिए गए आदेश में घुघली थाने के सब-इंस्पेक्टर राकेश कुमार यादव, कांस्टेबल अमित कुमार और करीब 20 अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ SC/ST एक्ट समेत गंभीर धाराओं में FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।

इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संतोष राय ने 9 अक्टूबर 2026 को निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने क्यों जताई नाराजगी ?

हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने पुलिस की रिपोर्ट पर उचित विचार नहीं किया और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) और 175(4) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया।

कोर्ट ने आदेश को बिना पर्याप्त कारण बताने वाला यानी ‘नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर’ माना। अदालत की टिप्पणी थी कि आदेश से ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित न्यायिक अधिकारी को आपराधिक कानून और उसकी प्रक्रिया की बुनियादी समझ का अभाव है। हाईकोर्ट ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताया।

अब FIR के आदेश से पहले इन बातों का रखना होगा ध्यान

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि यदि किसी लोक सेवक या पुलिसकर्मी पर लगाया गया आरोप उसकी आधिकारिक ड्यूटी के दौरान किए गए कार्य से संबंधित है, तो FIR का आदेश देने से पहले BNSS की धारा 175(4) के तहत निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाए।

इस प्रक्रिया में संबंधित कर्मचारी के उच्च अधिकारी की रिपोर्ट पर विचार करना और आरोपित कर्मचारी का पक्ष सुनना शामिल है। साथ ही, अदालत को अपने आदेश में स्पष्ट करना होगा कि आरोपित कृत्य का संबंध संबंधित कर्मचारी की आधिकारिक ड्यूटी से था या नहीं।

सरकारी कर्मचारियों को छूट देना मकसद नहीं: हाईकोर्ट

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों या पुलिसकर्मियों को कानूनी कार्रवाई से बचाना नहीं है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देने से पहले सभी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन हो और अदालत अपने फैसले के पीछे पर्याप्त कारण दर्ज करे।

हाईकोर्ट के निर्देशों और फैसले की प्रति प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों, जिलाधिकारियों (DM), वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों (SSP), पुलिस अधीक्षकों (SP) और पुलिस कमिश्नरों को भेजने के निर्देश दिए गए हैं।

न्यायिक प्रक्रिया में सावधानी पर जोर

इस फैसले से साफ है कि किसी लोक सेवक या पुलिसकर्मी के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देते समय केवल आरोपों के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता। अदालत को संबंधित रिपोर्ट, कर्मचारी का पक्ष और कानून में निर्धारित प्रक्रिया पर भी ध्यान देना होगा। हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को याद दिलाया है कि ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन और आदेश में स्पष्ट कारण दर्ज करना बेहद जरूरी है।

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