भरत तिवारी स्मारक पर नया संग्राम, अंचलाधिकारी ने रुकवाया चबूतरे का काम, जानें क्या हैं 2 बड़ी आपत्तियां…

बिहार के भोजपुर में 17 जून को हुए भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद अब उसके कथित एनकाउंटर स्थल पर स्मारक (चबूतरा) बनाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शाहपुर के अंचलाधिकारी ने सरकारी भूमि और बिना एनओसी (NOC) के निर्माण का हवाला देकर काम रुकवा दिया है।

बिहार के भोजपुर जिले में 17 जून को हुआ बहुचर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर थमने का नाम नहीं ले रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में सीबीआई (CBI) जांच से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट जाने की सलाह दिए जाने के बीच, अब इस केस से जुड़ा एक नया विवाद सामने आया है। यह पूरा विवाद कथित एनकाउंटर स्थल पर भरत तिवारी का स्मारक (चबूतरा) बनाए जाने को लेकर है। जैसे ही स्थानीय प्रशासन को इसकी भनक लगी, शाहपुर अंचलाधिकारी (CO) ने त्वरित कार्रवाई करते हुए निर्माण कार्य पर रोक लगवा दी।

उत्तराखंड के स्वामी उठा रहे थे खर्च, आदमकद प्रतिमा लगाने की थी तैयारी

बीती 24 जून को बिलौटी गांव में हुई महापंचायत के बाद ग्रामीणों और परिजनों ने एनकाउंटर स्थल पर स्मारक बनाने का फैसला किया था। इस स्मारक के निर्माण का पूरा खर्च उत्तराखंड के एक मठ के स्वामी आनंद स्वरूप महाराज उठा रहे थे। योजना के तहत पहले चरण में 8×8 वर्ग फीट का संगमरमर का चबूतरा बनना था, जिस पर बाद में भरत भूषण तिवारी की सफेद संगमरमर की आदमकद प्रतिमा स्थापित की जानी थी। इसके लिए पहली ईंट भी रख दी गई थी और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल थीं।

प्रशासन और निजी रैयत ने उठाईं दो बड़ी आपत्तियां

शाहपुर के अंचलाधिकारी आनंद प्रकाश के मुताबिक, इस निर्माण कार्य को रोकने के पीछे दो मुख्य कानूनी और प्रशासनिक आपत्तियां हैं:

जिस जमीन पर स्मारक का निर्माण शुरू किया गया था, वह बिहार सरकार की भूमि है। नियम के तहत किसी भी सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) के कोई भी निजी निर्माण पूरी तरह अवैध माना जाता है। इसके लिए निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत जिलाधिकारी से अनुमति नहीं ली गई थी।

स्मारक स्थल से सटी हुई निजी भूमि के रैयत (मालिक) ने लिखित आपत्ति दर्ज कराई है। उसका कहना है कि अगर स्मारक सड़क के बीच में नहीं बना, तो भविष्य में सड़क विस्तार के समय उनकी निजी जमीन का जबरन अधिग्रहण हो सकता है।

    सार्वजनिक स्मारक स्थापित करने का क्या है नियम?

    प्रशासनिक गाइडलाइंस के अनुसार, किसी भी व्यक्ति का सार्वजनिक स्मारक बनाने के लिए जिलाधिकारी के समक्ष प्रस्ताव देना होता है, जिसमें आकार, डिजाइन और स्थान का विवरण होता है। सड़क या सार्वजनिक स्थल होने पर यातायात पुलिस और सड़क निर्माण विभाग की एनओसी जरूरी होती है ताकि आमजन की आवाजाही प्रभावित न हो। फिलहाल, इन दोनों तकनीकी और भूमि संबंधी आपत्तियों का हल निकलने तक स्मारक का काम पूरी तरह ठप रहेगा।

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