इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला… क्या पुलिस की एक गलती से छूट गए आरोपी? जानें पहचान परेड को लेकर नए नियम…

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहचान परेड (शिनाख्त कार्यवाही) को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि बिना कारण देरी होने पर साक्ष्य का महत्व खत्म हो जाता है। जानिए इस कड़े फैसले की पूरी डिटेल।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लूट के एक मामले में सुनवाई करते हुए पहचान परेड को लेकर अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस और कारागार नियमावली के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि पहचान कार्यवाही आयोजित करने में बिना किसी ठोस कारण के अत्यधिक देरी होती है, तो इसका सीधा फायदा आरोपियों को मिलता है, क्योंकि इससे गवाहों द्वारा आरोपियों को पहले ही देख लिए जाने की आशंका काफी बढ़ जाती है।

न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि शिनाख्त कार्यवाही अपने आप में कोई मुख्य साक्ष्य नहीं है, बल्कि यह केवल गवाह की याददाश्त और सच्चाई को परखने का एक सहायक माध्यम है। किसी भी मामले में असली साक्ष्य तब माना जाता है, जब गवाह अदालत में जज के सामने आरोपी की शिनाख्त करता है। इस मामले में दशकों पुराने एक प्रकरण में आरोपियों को गवाहों के सामने पेश करने में हुई 42 दिन की देरी और प्रक्रियात्मक खामियों को आधार बनाते हुए अदालत ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया।

पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए उच्च न्यायालय ने कई कड़े नियम तय किए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि पहचान परेड की पूरी प्रक्रिया पुलिस थाने के बजाय जेल के भीतर न्यायिक दंडाधिकारी की देखरेख में होनी चाहिए, जिसमें पुलिस की भूमिका बिल्कुल शून्य हो। साथ ही, आरोपी का हुलिया न बदलने और अन्य हमशक्ल लोगों के बीच खड़ा करने जैसे दिशा-निर्देश भी दिए गए हैं ताकि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को गलत तरीके से न फंसाया जा सके।

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