
दलित समाज ने चंद्रशेखर को अपना “नगीना” बना लिया है। उनकी जीत जितनी बड़ी है। संघर्ष उससे भी बड़ा है। जनता के लिए सड़कों पर लड़े। जेल गए। हमले झेले। प्रताड़ना सही। जानलेवा हमला भी हुआ। लेकिन चंद्रशेखर मोर्चे से हटे नहीं।
उनके खिलाफ प्रचार में सब गए। मुख्यमंत्री और विपक्ष के टॉप लीडर्स तक। लेकिन चंद्रशेखर को नगीना में इतने वोट मिले की बाकी उम्मीदवार बहुत पीछे छूट गए।
दलित युवाओं के लिए चंद्रशेखर उनकी आकांक्षा के नए प्रतीक बनकर उभरे हैं। समाज उनमें अपना लीडर देखता है।
वहीं मायावती और आकाश आनंद का रुतबा घट गया है। बीच मैदान से आकाश को हटाना मायावती को भारी पड़ गया। दूसरी ओर चंद्रशेखर स्टार बनकर सामने आए हैं। अपने दम पर, वो भी जब सब उनके खिलाफ थे। हवा भी खिलाफ थी तब वो जीतकर आए।









