
दिल भी वही लगता है, जहाँ दाल गलती है! यह कहावत इस वक़्त जयंत चौधरी पर एकदम सटीक बैठता है। दरअसल, इस वक़्त चौधरी अपने बाप दादा से विरासत में मिली सियासत को बचाने के चक्कर में हैं। ऐसा माना जा रहा है कि छोटे चौधरी के नाम से मशहूर जयंत ने अब अपने सियासी विरासत को बचाने के लिए INDIA गठबंधन के साथ खेला करने का पूरा मन बना लिया है। जल्द ही इस बात के औपचारिक ऐलान की अटकले लगाई जा रही हैं। अगर ऐसा होता है तो चौधरी परिवार की वर्षों से खोई जाट बहुल सीटों पर जमीन वापस मिल जाएगा। अब ऐसा भी नहीं है कि RLD ऐसा कुछ पहली बार कर रहा हो। अपने 27 साल के सियासी इतिहास में आरएलडी कभी BJP, कभी कांग्रेस तो कभी बसपा सहित सभी प्रमुख दलों के साथ हाथ मिला चुकी है।
यह चौथी बार है जब चौधरी परिवार का दिल भारतीय जनता पार्टी के साथ लगा है। इन दोनों ही दलों के बीच का यह रिश्ता लगभग पांच दशक पुराना है। तो चलिए दिखाते हैं आपको कैसे चौधरी परिवार ने अपने सियासी इतिहास में दल बदल कर प्रदेश की सियासत को प्रभावित किया है।
राष्ट्रीय लोक दल के सितारे आज भले ही गर्दिश में हों, मगर एक दौर था जब यह पार्टी प्रदेश में किंगमेकर की भूमिका में थी। चौधरी परिवार में इस चीज के लिए चौधरी चरण सिंह का नाम सर्वोपरि था। वो न सिर्फ देश के पूर्व प्रधानमंत्री थे, बल्कि उत्तर भारत के किसानों के एकछत्र नेता भी थे। आज भी देश के किसान उन्हें अपना मसीहा मानते हैं। वर्ष 1980 में उन्ही की उंगली पकड़कर चौधरी अजित सिंह ने सियासत में कदम रखा था। ऐसे में जब अजित सिंह ने राजनीति में कदम रखा तो उनके पास अपने पिता की बड़ी विरासत पहले से ही मौजूद थी। मगर फिर ऐसा क्या हो गया जिससे पार्टी का इतना मजबूत जनाधार बिखर गया। चलिए एक नजर उसपर भी डालते हैं……
कांग्रेस ने किया बेड़ा गर्क
बात है 1987 की, जब अपने पिता चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद चौधरी अजित सिंह ने पार्टी के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला। फिर 1988 में ही उन्हें जनता पार्टी का अध्यक्ष घोषित कर दिया गया। उस समय चौधरी अजीत अपने पिता की तरह देश के प्रधानमंत्री पद पाने के लिए मौका तलाश रहे थे। मगर सियासी परिस्थितियों के चलते उन्हें कांग्रेस का साथ देकर केंद्रीय मंत्री पद पर ही संतोष करना पड़ा। यही वो पल था जब RLD का जनाधार पूरी तरह बिखरना शुरू हो गया। जिसके चलते वो कांग्रेस के साथ ज्यादा दिन नहीं टिक पाए और 1996 के लोकसभा चुनाव के बाद वह फिर अलग हो गए। इसके बाद संयुक्त मोर्चा का हिस्सा बन गए। उस समय मुलायम सिंह यादव भी इसमें शामिल थें। अजित, देवगौड़ा और गुजराल सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं।
वक़्त बीतता गया और अजित सिंह सियासी मुनाफे के लिए पाला बदलने की राजनीति करते रहे। उनके इसी रवैये ने उन्हें 1988 में हुए लोकसभा चुनाव में हार का मुँह भी दिखाया। साल 1999 का दौर था जब अजित ने लोकसभा चुनाव में जीत हांसिल कर बीजेपी से समझौता किया। देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अगुवाई वाली सरकार में वो कृषि मंत्री बने, मगर चार दिन की चांदनी के तरह वो भी ज्यादा दिन टिक नहीं पाएं। दरअसल, साल 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने BJP के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस चुनाव में RLD 14 सीटें जीतने में सफल भी रही, लेकिन चुनाव के बाद अजित सिंह ने अटल सरकार से इस्तीफा दे दिया और बीजेपी से गठबंधन तोड़ लिया। जिसका सियासी असर यूपी की राजनीति पर भी देखने को मिला था।
बीजेपी का साथ छोड़ने के बाद अजित सिंह ने मुलायम सिंह यादव को समर्थन देकर उनकी सरकार बनवाई। उस समय कांग्रेस को इसके लिए तैयार करने में भी उनकी भूमिका अहम थी। उनके इसी भूमिका को देखते हुए मुलायम सरकार में RLD के सात विधायक मंत्री बनाए गए थे। पर शायद चौधरी परिवार का दिल वहां भी नहीं लगा तो अपनी दाल गलाने के लिए उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर पाला बदलते हुए समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर अपनी किस्मत आजमाई, जो उनके लिए तो नहीं मगर सपा के लिए फायदेमंद रहा। इस चुनाव में अजीत की पार्टी तीन सीटें जीतने में सफल रही तो सपा को 35 सीटें मिली। लेकिन उनके साथ भी बस चार साल तक चल पाया। बाद में दोनों पार्टियों का गठबंधन टूट गया।
इसी प्रकार अजीत ने 2009 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर BJP का हाथ थाम अपनी किस्मत आजमाई, मगर हर बार की तरह इस बार भी अजीत सिंह बीजेपी के साथ ज्यादा लम्बा सफर नहीं तय कर पाए और दोनों पार्टियों के बीच बढ़ते खट्टास के चलते दोनों अलग हो गए। इसके बाद 2011 में यूपीए-2, 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ रिश्ता मजबूत किया। मगर वो कहते हैं न एक मियान में दो तलवार नहीं रह सकते कुछ ऐसा ही RLD के साथ हुआ। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा में दोस्ती हो जाने के चलते RLD हाशिए पर पहुंच गई और इसका भुगतान दोनों ही पार्टियों को भुगतना पड़ा। जिसके बाद RLD का दिल कांग्रेस से हट कर सपा से लग गया और आगामी यानी 2019 के लोकसभा चुनाव में इन दोनों ने साथ मिलकर बसपा से हाथ मिलाते हुए चुनावी मैदान में उतरने का फैसला लिया।
2022 आते-आते RLD और सपा दोनों ने BSP का साथ छोड़ते हुए अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। यह पहली बार था जब किसी पार्टी के साथ चौधरी परिवार और उनकी पार्टी ने इतना लम्बा सफर तय किया और इसी के चलते 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद सपा ने चौधरी अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी को अपने कोटे से राज्यसभा भेजा। इतना ही नहीं आगामी 2024 के चुनाव को भी सपा ने आरएलडी के साथ लड़ने का समझौता किया मगर लगता है अपने पिता और दादा से मिली सियासी विरासत और दल बदलने वाली आदत को बचाते हुए सपा से अपना साथ छुड़ाकर बीजेपी के साथ जाने का मन बना लिया है। इस बात को आरएलडी नेता भी खुलकर कह रहे हैं। वहीं, BJP भी RLD का खुले बाहों से स्वागत कर रही है।
ऐसे में एक बात तो साफ़ हो गया है कि अब एक बार फिर से RLD द्वारा BJP के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का तानाबाना बुना जा रहा है। अब देखना यह है कि इस बार क्या सियासी करिश्मा जयंत चौधरी दिखा पाते हैं? क्या इस बार जयंत अपनी खोई विरासत और जनाधार को वापस आएंगे या फिर अपने पिता के तरह ही वो भी दल बदलते रह जाएंगे।









