दलित राजनीति के शिल्पकार कांशीराम, जिनकी सोच ने बदली भारतीय राजनीति की दिशा, जानिए उनका जीवन और राजनीतिक सफर

उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में आज बहुजन आंदोलन के प्रमुख नेता और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती मनाई जा रही है। दलित राजनीति को नई दिशा देने वाले कांशीराम ने देश की राजनीति में ऐसा बदलाव किया जिसने दलित और वंचित समाज को अपनी ताकत का एहसास कराया। उन्होंने समाज के उन वर्गों को राजनीतिक रूप से संगठित करने का काम किया जो लंबे समय तक सत्ता और निर्णय प्रक्रिया से दूर रहे थे।

कांशीराम का मानना था कि सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम राजनीतिक ताकत होती है। इसी सोच के साथ उन्होंने बहुजन समाज को अपने वोट की ताकत पहचानने का संदेश दिया। उनका मशहूर नारा “वोट से लेंगे सीएम-पीएम” आज भी भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय बना रहता है। इस नारे के जरिए उन्होंने दलित, पिछड़े और वंचित समाज को यह समझाने की कोशिश की कि लोकतंत्र में वोट ही सबसे बड़ी ताकत है।

भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से देश में समानता और मौलिक अधिकारों की बात कही थी। उन्होंने हर नागरिक को समान अवसर देने की व्यवस्था की। हालांकि आजादी के बाद भी समाज के कई वर्ग ऐसे थे जिन्हें सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बराबरी का अधिकार पूरी तरह नहीं मिल पाया था। ऐसे समय में कांशीराम ने बहुजन समाज के बीच राजनीतिक जागरण की शुरुआत की और उन्हें संगठित करने का प्रयास किया।

पुणे की घटना जिसने बदल दी जिंदगी

कांशीराम के जीवन में एक ऐसी घटना घटी जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। यह घटना पुणे की एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेट्री की बताई जाती है, जहां वे नौकरी करते थे। उस समय की बात है जब ऑफिस में काम करने वाले एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दीना भामा ने डॉ. अंबेडकर जयंती के अवसर पर छुट्टी मांगी थी। लेकिन उनके वरिष्ठ अधिकारी ने छुट्टी देने से इनकार कर दिया। दीना भामा ने छुट्टी लेने पर जोर दिया तो उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया। यह घटना ऑफिस में तेजी से फैल गई। इसी दौरान वहां कार्यरत एक युवा अधिकारी को इस मामले की जानकारी मिली। वह अधिकारी कांशीराम थे, जो उस समय लगभग 24 वर्ष के थे। कांशीराम ने जब दीना भामा से पूरी घटना के बारे में बात की तो उन्हें महसूस हुआ कि उनके साथ अन्याय हुआ है। दीना भामा ने बताया कि वे बहुजन समाज से आते हैं और इसी वजह से उनके साथ यह व्यवहार किया गया। इस घटना ने कांशीराम को समाज की उस सच्चाई से रूबरू कराया जिसे उन्होंने पहले इतनी गंभीरता से नहीं देखा था।

बाबासाहेब के विचारों से मिली प्रेरणा

इस घटना के बाद कांशीराम ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को गहराई से समझना शुरू किया। उन्होंने अंबेडकर की प्रसिद्ध पुस्तक एनहिलेशन ऑफ कास्ट सहित कई अन्य किताबों का अध्ययन किया। इन किताबों के माध्यम से उन्हें भारतीय समाज में मौजूद जातीय असमानता और दलितों की स्थिति का गहरा अहसास हुआ। कांशीराम ने महसूस किया कि केवल सरकारी नौकरी करने से समाज में व्यापक बदलाव संभव नहीं है। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन के माध्यम से बदलाव लाने का निर्णय लिया। लगभग एक दशक तक नौकरी करने के बाद उन्होंने सरकारी सेवा छोड़ दी और पूरी तरह सामाजिक आंदोलन में सक्रिय हो गए।

सामाजिक आंदोलन से राजनीतिक यात्रा तक

कांशीराम ने वर्ष 1964 में एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया को समर्थन दिया। लेकिन बाद में पार्टी की राजनीतिक दिशा से असंतुष्ट होकर उन्होंने स्वतंत्र संगठन बनाने का फैसला किया। वर्ष 1971 में उन्होंने एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक कर्मचारियों के संगठन की स्थापना की। बाद में यही संगठन 1978 में वामसेफ के नाम से जाना गया। इस संगठन का उद्देश्य पढ़े-लिखे दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को अंबेडकरवादी विचारधारा से जोड़ना था। इसके बाद 1981 में कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति यानी डीएस-4 का गठन किया। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने समाज के वंचित वर्गों को राजनीतिक रूप से संगठित करने का अभियान चलाया। कांशीराम का मानना था कि बहुजन समाज अगर एकजुट हो जाए तो देश की राजनीति की दिशा बदल सकती है।

बहुजन समाज पार्टी की स्थापना

वर्ष 1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। इस पार्टी का उद्देश्य दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाना था। पार्टी के गठन के बाद उन्होंने कहा था कि पहला चुनाव हारने के लिए लड़ेंगे, दूसरा चुनाव पहचान बनाने के लिए और तीसरा चुनाव जीतने के लिए। उन्होंने 1984 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद भी उन्होंने लगातार राजनीतिक संघर्ष जारी रखा। 1988 में उन्होंने इलाहाबाद से चुनाव लड़ा और 1989 में पूर्वी दिल्ली से चुनावी मैदान में उतरे।

उत्तर प्रदेश में बड़ी राजनीतिक सफलता

कांशीराम की राजनीतिक रणनीति का सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिला। 1991 में उन्होंने समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव के साथ गठबंधन किया। इस गठबंधन ने प्रदेश की राजनीति में नया समीकरण पैदा किया। इसी दौर में बसपा की नेता मायावती का उभार भी हुआ। मायावती ने कांशीराम के नेतृत्व में राजनीति में तेजी से पहचान बनाई। बसपा धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक ताकत बन गई। कांशीराम 1991 में इटावा से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। इसके बाद 1996 में पंजाब के होशियारपुर से जीतकर वे दूसरी बार लोकसभा पहुंचे। हालांकि इस दौरान उनकी तबीयत लगातार खराब रहने लगी थी। वर्ष 2001 में उन्होंने मायावती को सार्वजनिक रूप से अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया।

अंतिम समय और विरासत

कांशीराम ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बौद्ध धर्म अपनाने की इच्छा जताई थी। वे डॉ. अंबेडकर की तरह बौद्ध धर्म को अपनाने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन इससे पहले ही 9 अक्टूबर 2006 को उनका निधन हो गया। कांशीराम ने अपने पूरे जीवन में बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करने का काम किया। उन्होंने दलितों और वंचित वर्गों को यह एहसास कराया कि लोकतंत्र में उनकी भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है। आज भी भारतीय राजनीति में कांशीराम के विचार और उनकी राजनीतिक रणनीति का प्रभाव देखा जा सकता है। दलित राजनीति को नई दिशा देने वाले इस नेता को उनकी जयंती पर पूरे देश में श्रद्धा के साथ याद किया जा रहा है।

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