क्या वाकई परमाणु हमले में भी जिंदा रह सकते हैं कॉकरोच? जानिए इसके पीछे का असली विज्ञान

हाल ही में 'कॉकरोच जनता पार्टी' के चर्चा में आने के बाद, इंटरनेट पर एक पुरानी वैज्ञानिक बहस फिर से छिड़ गई है—क्या कॉकरोच परमाणु हमले में...

हाल ही में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के चर्चा में आने के बाद, इंटरनेट पर एक पुरानी वैज्ञानिक बहस फिर से छिड़ गई है—क्या कॉकरोच परमाणु हमले में जीवित रह सकते हैं? दशकों से यह दावा किया जाता रहा है कि ये जीव परमाणु धमाके के बाद भी बच सकते हैं। लेकिन विज्ञान इस बारे में क्या कहता है, यह समझना बेहद दिलचस्प है।

धमाके की चपेट में आने पर नहीं बच सकते सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि परमाणु धमाके के केंद्र (ग्राउंड जीरो) पर तापमान सूरज की सतह के बराबर, यानी लाखों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इस भीषण गर्मी और शॉकवेव्स के सामने कॉकरोच भी इंसानों की तरह ही पल भर में जलकर राख हो जाएंगे। जो कॉकरोच सीधे धमाके की चपेट में आएंगे, उनका बचना असंभव है।

तो फिर यह भ्रांति क्यों फैली? यह मिथक इसलिए लोकप्रिय हुआ क्योंकि कॉकरोच का स्वभाव छिपने का होता है। वे जमीन के नीचे, दरारों या मजबूत कंक्रीट की दीवारों के अंदर सुरक्षित रहते हैं, जो उन्हें प्रारंभिक शॉकवेव्स और गर्मी से बचा सकता है। इसके अलावा, रेडिएशन का असर कोशिकाओं के विभाजन पर निर्भर करता है। इंसानी कोशिकाएं तेजी से विभाजित होती हैं, जिससे वे रेडिएशन के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं, जबकि कॉकरोच की कोशिकाओं का विभाजन चक्र बहुत धीमा होता है, जो उन्हें अधिक रेडिएशन झेलने की शक्ति देता है।

शोध बताते हैं कि जहां इंसान 1000 rad रेडिएशन में दम तोड़ सकता है, वहीं कॉकरोच कहीं अधिक मात्रा में भी जीवित रहने की क्षमता रखते हैं। अंततः, कॉकरोच ‘अमर’ नहीं हैं, बस उनकी शारीरिक संरचना और जीवनशैली उन्हें रेडिएशन के प्रति अधिक सहनशील बनाती है।

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