24 साल पुराने अपहरण केस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, कहा- ‘तारीख पे तारीख’ नहीं बन सकती न्याय व्यवस्था की पहचान

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 साल से अधिक समय से लंबित चल रहे एक अपहरण के आपराधिक मुकदमे पर गंभीर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में बार-बार मिलने वाली तारीखें और लंबी देरी किसी भी स्थिति में सामान्य प्रक्रिया नहीं बननी चाहिए। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि चर्चित कहावत “तारीख पे तारीख” न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बन सकती।

मुकदमे की गंभीरता भी प्रभावित होती है

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति राजीव भारती की पीठ ने वर्ष 2001 में दर्ज अपहरण के एक मामले में दो आरोपियों को अग्रिम जमानत देते हुए की। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में कई वर्षों तक सुनवाई की प्रक्रिया में कोई प्रभावी प्रगति नहीं हुई और मुकदमा लंबे समय तक निष्क्रिय अवस्था में पड़ा रहा। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले का उद्देश्य केवल प्रक्रिया को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि समय पर न्याय उपलब्ध कराना होता है। लंबे समय तक चलने वाली कार्यवाही से न केवल न्याय में देरी होती है, बल्कि मुकदमे की गंभीरता भी प्रभावित होती है।

न्याय को अंतहीन स्थगनों और संस्थागत निष्क्रियता का शिकार नहीं बनाया जा सकता

कोर्ट ने यह भी कहा कि न्याय को अंतहीन स्थगनों और संस्थागत निष्क्रियता का शिकार नहीं बनाया जा सकता। न्यायिक प्रक्रिया में तेजी और प्रभावशीलता बेहद जरूरी है, ताकि पीड़ित और आरोपी दोनों को समय पर न्याय मिल सके। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने लंबित मामलों के निपटारे की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली में अनावश्यक देरी को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी लंबे समय से लंबित मुकदमों को लेकर न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत को भी रेखांकित करती है।

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