तमिलनाडु की लोक परंपराओं को मिला नया मंच… 300 से ज्यादा कलाकारों ने बिखेरा लोक संस्कृति का रंग…

थूथुकुडी में पांचवां 'नेयथल आर्ट्स एंड फूड फेस्टिवल' संपन्न। 300 से अधिक कलाकारों ने पारंपरिक लोक कला और तटीय संस्कृति का किया प्रदर्शन। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

थूथुकुडी: तमिलनाडु की समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक कला और तटीय जीवन की झलक दिखाने वाला पांचवां नेयथल आर्ट्स एंड फूड फेस्टिवल रविवार देर रात संपन्न हो गया। थूथुकुडी के वी.ओ.सी. ग्राउंड में 14 से 16 अगस्त तक आयोजित इस तीन दिवसीय महोत्सव में हर शाम बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। शाम 5 बजे से रात 10 बजे तक चले कार्यक्रम में तमिलनाडु के अलग-अलग हिस्सों से आए 300 से अधिक लोक कलाकारों ने पारंपरिक कला रूपों की प्रस्तुतियां दीं।

महोत्सव में लोक कला और संगीत के साथ पारंपरिक तटीय खान-पान को भी प्रमुखता दी गई। 30 से अधिक फूड स्टॉल लगाए गए, जहां क्षेत्रीय और पारंपरिक तटीय व्यंजन लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे। इसके अलावा ग्रामीण महिला कारीगरों ने हस्तशिल्प की लाइव प्रदर्शनी लगाई। इस तरह कला, संगीत, भोजन और हस्तशिल्प ने मिलकर इसे महज एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के बजाय तमिलनाडु की ग्रामीण और तटीय संस्कृति का व्यापक उत्सव बना दिया।

संगम साहित्य से जुड़ा है ‘नेयथल’ नाम

नेयथल महोत्सव का नाम तमिल के प्राचीन संगम साहित्य में वर्णित पांच भौगोलिक परिदृश्यों में से एक ‘नेयथल’ से लिया गया है। नेयथल का संबंध समुद्र और तटीय भू-भाग से है। सदियों से इन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों का जीवन, रोजगार, भोजन, संगीत और लोक परंपराएं समुद्र से जुड़ी रही हैं।

इसी सांस्कृतिक विरासत को सामने लाने के उद्देश्य से यह महोत्सव पारंपरिक कलाओं और ग्रामीण जीवन से जुड़ी परंपराओं को बड़े सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत करता है।

300 से ज्यादा कलाकारों ने पेश की पारंपरिक कलाएं

इस साल महोत्सव की शुरुआत 14 अगस्त को गणेश्का सिलंबम थूथुकुडी की प्रस्तुति से हुई। इसके बाद तमिलनाडु की कई पारंपरिक लोक कलाओं का प्रदर्शन किया गया। इनमें देवराट्टम, ओयिलाट्टम, थप्पाट्टम, पोइक्कल कुथिरई और कनियान कूथु जैसी कलाएं शामिल रहीं।

कार्यक्रम में लोक कलाओं के साथ आधुनिक संगीत का भी संगम देखने को मिला। महोत्सव के प्रमुख आकर्षणों में संगीत कलाकार काबेर वासुकी की प्रस्तुति रही।

लोक कला की दुनिया के वरिष्ठ कलाकार और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित पारंपरिक परई कलाकार वेलु आसन ने भी महोत्सव में हिस्सा लिया। वह नेयथल के प्रत्येक संस्करण में अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। उनके माध्यम से मिट्टी और समुदाय से जुड़ी परई वादन की पारंपरिक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।

लोक कला सिर्फ मनोरंजन नहीं, लोगों के जीवन की कहानी

महोत्सव में शामिल कलाकारों और आयोजकों के लिए लोक कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यह ग्रामीण और तटीय समुदायों के जीवन, संघर्ष, खुशियों और अनुभवों को व्यक्त करने का माध्यम भी है।

कार्यक्रम में बोलते हुए सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने लोक कलाओं को ‘जनता की कलाएं’ बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों के लोकगीतों में वहां के लोगों के खान-पान, पेड़-पौधों, व्यवसाय, नावों और मछली पकड़ने के जाल तक का उल्लेख मिलता है।

यानी लोकगीत और लोक कलाएं केवल मंच पर होने वाली प्रस्तुतियां नहीं हैं, बल्कि इनके भीतर सदियों से चली आ रही सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृतियां भी मौजूद हैं। इसलिए इन कलाओं को संरक्षित करना उन समुदायों के जीवन और इतिहास को संरक्षित करने जैसा है।

ग्रामीण कलाकारों को मिला बड़ा मंच

तमिलनाडु में लोक कला और पारंपरिक प्रदर्शन की समृद्ध परंपरा रही है। हालांकि बदलती जीवनशैली, आधुनिक मनोरंजन और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के बीच कई पारंपरिक कला रूपों के सामने अस्तित्व का संकट भी खड़ा हुआ है।

कई लोक कलाकार आज भी छोटे ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित हैं और उनकी कला को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचने का अवसर कम मिलता है। ऐसे में नेयथल जैसे महोत्सव कलाकारों को एक बड़ा मंच उपलब्ध कराते हैं।

यहां युवा दर्शकों को भी पारंपरिक कलाओं से जुड़ने और उन्हें करीब से देखने का अवसर मिलता है। साथ ही कलाकारों और ग्रामीण कारीगरों को पहचान, सम्मान और अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर मिलता है।

सरकार बदली, लेकिन नहीं रुका नेयथल

इस साल नेयथल महोत्सव का एक अलग महत्व भी रहा। 2022 से 2025 तक इसके पहले चार संस्करण उस समय आयोजित किए गए थे, जब तमिलनाडु में डीएमके की सरकार थी। उस दौरान राज्य सरकार और जिला प्रशासन का सहयोग भी आयोजन में शामिल रहा।

बाद में राज्य में सरकार बदलने के बावजूद नेयथल 2026 का आयोजन जारी रहा। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के साथ कई स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर की पहलें धीरे-धीरे बंद हो जाती हैं।

लेकिन नेयथल को जारी रखने के पीछे सांस्कृतिक उद्देश्य को प्रमुखता दी गई। इसका उद्देश्य पारंपरिक कलाकारों के लिए एक ऐसा मंच बनाए रखना है, जहां वे अपनी कला को नई पीढ़ी और बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचा सकें।

संस्कृति को मंच देने की कोशिश

नेयथल महोत्सव की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां लोक संस्कृति को केवल अतीत की विरासत के तौर पर पेश नहीं किया जाता। परंपरागत संगीत, नृत्य, भोजन और हस्तशिल्प को आज के दर्शकों के सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

थूथुकुडी में तीन दिनों तक चले इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि तमिलनाडु की लोक परंपराएं केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं हैं। वे आज भी ग्रामीण और तटीय समुदायों के जीवन का हिस्सा हैं।

नेयथल जैसे मंच इन परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ-साथ उन कलाकारों को भी पहचान देने का काम कर रहे हैं, जिन्होंने वर्षों से इन लोक कलाओं को जीवित रखा है। यही वजह है कि नेयथल महोत्सव को तमिलनाडु की लोक और तटीय संस्कृति को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तौर पर देखा जा सकता है।

Related Articles

Back to top button