
वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भले ही इसे कभी स्वीकार न करें, लेकिन यह साफ दिख रहा है कि दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र कहलाने वाला अमेरिका अब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के राजनीतिक तरीके अपना रहा है। इसकी पहली झलक वोटिंग के लिए फोटो पहचान पत्र की ट्रंप की जिद में दिखी थी और अब सीधे पैसे देने का वादा सामने आया है।
डलास में ट्रंप ने रखा ‘डिविडेंड’ प्रस्ताव
डलास में हुए रिपब्लिकन मिडटर्म कन्वेंशन में ट्रंप ने वोटरों के सामने एक लेन-देन वाला प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में रिपब्लिकन को सत्ता में वापस लाएं और हर बालिग अमेरिकी नागरिक को 5,000 डॉलर मिल सकते हैं। ट्रंप ने समर्थकों से कहा, मान लीजिए कि मैं एक बार फिर बैलेट पेपर पर हूं।
भारत की DBT योजना से मिलती-जुलती है सोच
पिछले एक दशक में भारत के कल्याणकारी राज्य का स्वरूप काफी बदल गया है। मोदी सरकार की डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना ने सरकार और वोटर के बीच के रिश्ते को ही बदल दिया। पैसे सीधे बैंक खातों में आने लगे, जिससे वोटर को सरकारी नीति समझाने के लिए किसी नेता की जरूरत नहीं पड़ती। यह चुनावी तौर पर बेहद फायदेमंद साबित हुआ।
भारत के राज्यों ने इसे और आगे बढ़ाया और लड़कियों व महिलाओं को सीधी नकद सहायता देना चुनाव जीतने का सबसे असरदार हथियार बन गया। ट्रंप के 5,000 डॉलर वाले प्रस्ताव के पीछे भी यही राजनीतिक सोच काम कर रही है, हालांकि उनका यह प्रस्ताव भारत की डीबीटी योजना की तरह किसी खास वर्ग को टारगेट नहीं करता और इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी चाहिए, जो इसके लिए तैयार नहीं दिखती।
वोटर आईडी को लेकर भारत और ब्राजील का दिया उदाहरण
भारत से मिलती-जुलती एक और बात है वोटर की पहचान के लिए ट्रंप का सख्त नियम लागू करने पर जोर देना। मार्च 2025 में फेडरल चुनाव प्रक्रियाओं में बदलाव के लिए जारी अपने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में ट्रंप ने साफ तौर पर भारत और ब्राजील का जिक्र किया था, जहां वोटर की पहचान को बायोमेट्रिक डेटाबेस से जोड़ा जाता है। ट्रंप ने लिखा कि हमें अभी ‘द सेव अमेरिका एक्ट’ पास करना होगा। इस कानून के तहत फेडरल वोटिंग के लिए नागरिकता का सबूत और सरकार द्वारा जारी फोटो आईडी जरूरी हो जाएगी।









