किन्नर ताली क्यों बजाते हैं? क्या है इस खास ताली का मतलब, जानिए समुदाय से जुड़ी ये बातें

अक्सर आपने देखा होगा कि शादी-ब्याह जैसे तमाम खुशी के मौकों पर किन्नर पहुंचते हैं और तालियां बजाते हुए दुआएं देते हैं। लेकिन उनकी तालियों की आवाज आम तालियों से अलग होती है। किन्नर समुदाय में ताली बजाने का एक खास अंदाज होता है और इसे उनकी पहचान से जोड़कर देखा जाता है। आखिर इस खास ताली का क्या मतलब होता है और किन्नर इसे क्यों बजाते हैं? आइए जानते हैं।

खास तरीके से बजाई जाती है किन्नर ताली

किन्नर समुदाय में ताली बजाने का तरीका सामान्य तालियों से अलग होता है। मान्यता है कि ताली की आवाज और उसे बजाने के खास तरीके से समुदाय का एक सदस्य दूसरे की पहचान कर सकता है।

किन्नर अक्सर महिलाओं के कपड़ों में नजर आते हैं, हालांकि कई बार वे पुरुषों की पोशाक में भी होते हैं। ऐसे में समुदाय के दूसरे लोगों से पहचान बनाने और जुड़ने में ताली की अपनी एक भूमिका मानी जाती है।

शादी-ब्याह और दूसरे उत्सवों में किन्नर घर पहुंचकर ताली बजाते हैं और खुशी का इजहार करते हैं। समुदाय के भीतर भी ताली के जरिए भावनाएं व्यक्त करने का चलन बताया जाता है। खुशी हो या गुस्सा, बातचीत के दौरान भी ताली बजाने की परंपरा देखने को मिलती है।

क्या ताली एक तरह की एक्युप्रेशर थेरेपी है?

कुछ योगाचार्यों का मानना है कि ताली बजाने से शरीर के कुछ हिस्सों पर दबाव पड़ता है और इसे एक्युप्रेशर से जोड़ा जा सकता है। किन्नर समुदाय में ताली बजाने की आदत को इसी वजह से स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद बताया जाता है।

हालांकि, ताली बजाने को बीमारी से बचाव या इलाज की प्रमाणित चिकित्सा पद्धति मानने के लिए वैज्ञानिक प्रमाणों की जरूरत होती है। इसलिए इसे किसी बीमारी के इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

किन्नर समुदाय में शामिल होने की प्रक्रिया भी अलग

किन्नर समुदाय से जुड़ी कई सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी हैं। समुदाय में किसी नए सदस्य को शामिल करने के लिए विभिन्न रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है।

नए सदस्य की शारीरिक और मानसिक अवस्था को लेकर भी प्रक्रिया अपनाई जाती है। समुदाय में शामिल होने के बाद कई जगहों पर भोज, नाच-गाना और अन्य सामाजिक रस्में आयोजित की जाती हैं।

गुरु-चेले की परंपरा से चलता है समुदाय

किन्नर समुदाय के कई सदस्य मिल-जुलकर परिवार की तरह रहते हैं। समुदाय में सबसे अनुभवी सदस्य को गुरु मानने की परंपरा है। गुरु ही समुदाय के परिवार की व्यवस्था को संभालता है।

पैसों के लेनदेन और खर्च से जुड़े कई फैसले भी गुरु की व्यवस्था के तहत किए जाते हैं। इस तरह गुरु-चेले की परंपरा समुदाय की सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

उत्सवों में दुआएं देकर होती है कमाई

किन्नर समुदाय के कई सदस्य शादी-ब्याह और दूसरे उत्सवों में जाकर दुआएं देते हैं और इसी के जरिए कमाई करते हैं। हालांकि समय के साथ समाज की मुख्यधारा में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है और कुछ किन्नर नौकरी और दूसरे पेशों से भी जुड़ रहे हैं।

फिर भी बड़ी संख्या में समुदाय के लोग पारंपरिक तौर-तरीकों से ही अपनी आजीविका चलाते हैं। किन्नर समुदाय की ताली, उनकी सामाजिक संरचना और गुरु-चेले की परंपरा उनकी अलग सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती है।

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