“पहले 56 भोग के लिए भी तरसती थी आस्था, अब हर रोज़ उत्सव…” रामलला के टेंट से दिव्य दरबार तक के सफर की भावुक दास्तान

उत्तर प्रदेश की पावन नगरी अयोध्या में भगवान श्रीराम के विराजमान होने से लेकर उनके भव्य और दिव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा तक का सफर केवल एक इमारत या संरचना के निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि यह करोड़ों रामभक्तों के सदियों पुराने सब्र, अटूट आस्था और व्यवस्थागत बदलाव की जीवंत दास्तान है। वर्ष 2019 से पहले का वह दौर भी देश ने देखा है जब तीनों लोकों के स्वामी प्रभु श्रीराम एक अस्थायी टेंट में विराजमान थे। उस समय रामलला की पूजा-अर्चना, वस्त्र बदलने और धार्मिक पर्वों को मनाने के लिए भी सरकारी तंत्र और कमिश्नर-रिसीवर की अनुमति की कठिन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था।

स्थानीय महंत और प्रत्यक्षदर्शी शिकांत दास बताते हैं कि जब रामलला टेंट में विराजमान थे, तब व्यवस्थाओं पर कड़ा पहरा और पाबंदियां हुआ करती थीं। प्रभु रामलला को 56 भोग अर्पित करने जैसे विशेष और पवित्र धार्मिक आयोजन के लिए भी हफ्तों पहले अर्जी लगानी पड़ती थी और अनुमति लेनी होती थी। उस दौर में पूरे साल में केवल रामनवमी के पावन अवसर पर ही प्रभु के लिए विशेष रूप से नए वस्त्र तैयार कराए जाने की परंपरा मुख्य रूप से निभाई जाती थी। होली, दीपावली, सावन झूलनोत्सव और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जैसे बड़े पर्व भी बेहद सीमित और सांकेतिक रूप में सुरक्षा घेरे के बीच मनाए जाते थे।

लेकिन 22 जनवरी 2024 को नवनिर्मित और भव्य राम मंदिर में जब रामलला की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई, तो उसके बाद अयोध्या की पूरी तस्वीर और आबो-हवा ही बदल गई। टेंट की पाबंदियों का दौर अब इतिहास बन चुका है और उसकी जगह अलौकिक वैभव तथा नित्य भक्ति ने ले ली है। अब भव्य राम मंदिर में प्रभु रामलला की नित्य सेवा-पूजा एक सुपरिभाषित और शास्त्रसम्मत दिनचर्या के अनुसार संचालित होती है।

आज रामलला के दरबार में हर दिन एक नया उत्सव होता है। मौसम और ऋतुओं के अनुरूप भगवान के लिए विशेष रेशमी, जरीदार और सुशोभित वस्त्रों का चयन किया जाता है। प्रतिदिन सुबह प्रभु का दिव्य स्नान, नए वस्त्रों और कीमती आभूषणों से अनुपम श्रृंगार होता है। अलग-अलग प्रहर के अनुसार रामलला को विविध प्रकार के सात्विक भोग, बाल-भोग और छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं।

अब अयोध्या में सावन का झूलनोत्सव हो, सरयू तट की भव्य दीपावली हो, रंगों भरी होली हो या फिर रामनवमी का महापर्व—हर त्योहार पर मंदिर परिसर में अभूतपूर्व उमंग और आध्यात्मिक ऊर्जा देखने को मिलती है। देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु न केवल गर्भगृह में जाकर रामलला के मनमोहक स्वरूप के साक्षात दर्शन कर रहे हैं, बल्कि डिजिटल माध्यमों और लाइव प्रसारण के जरिए दुनिया के कोने-कोने में बैठे भक्त भी नित्य आरती और विशेष अनुष्ठानों का पुण्य लाभ उठा रहे हैं।

टेंट के अस्थायी निवास से लेकर सोने से मढ़े भव्य महल तक का यह दिव्य सफर सिद्ध करता है कि समय बदलता है और जब आस्था रंग लाती है, तो पूरी रामनगरी की धार्मिक और सामाजिक चेतना को एक नया और अखंड विस्तार मिल जाता है।

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